मारि गयौ पिचकारी अचानक, थोरी सरीर में थोरी हिये में। [1]
भीजि गई सगरी अँगिया, रसधार बही बरजोरी हिये में॥ [2]
चोरत प्रीति, निचोरत चीर, संकोचत सोचति गोरी हिये में। [3]
भाल अबीर गुलाल कपोलन, नैनन में रंग होरी हिये में॥ [4]
- ब्रज के सवैया
हे सखी, श्रीकृष्ण अचानक आ गए और मेरे अंगों तथा हृदय में पिचकारी से रंग मार दिया। [1]
मेरे समस्त वस्त्र भीग गए और अकस्मात ही मेरे हृदय में रसधारा बहने लगी। [2]
संकोच में प्रेम छिपाने की चेष्टा कर, भीगे वस्त्र निचोड़ते हुए,मन ही मन सोचने लगी। [3]
माथे पर अबीर, गालों पर गुलाल और आँखों में होली का प्रेमरंग छा गया है। [4]
भीजि गई सगरी अँगिया, रसधार बही बरजोरी हिये में॥ [2]
चोरत प्रीति, निचोरत चीर, संकोचत सोचति गोरी हिये में। [3]
भाल अबीर गुलाल कपोलन, नैनन में रंग होरी हिये में॥ [4]
- ब्रज के सवैया
हे सखी, श्रीकृष्ण अचानक आ गए और मेरे अंगों तथा हृदय में पिचकारी से रंग मार दिया। [1]
मेरे समस्त वस्त्र भीग गए और अकस्मात ही मेरे हृदय में रसधारा बहने लगी। [2]
संकोच में प्रेम छिपाने की चेष्टा कर, भीगे वस्त्र निचोड़ते हुए,मन ही मन सोचने लगी। [3]
माथे पर अबीर, गालों पर गुलाल और आँखों में होली का प्रेमरंग छा गया है। [4]

