चिरजीवो होरी के रसिया।
नित प्रति आवौं मेरे होरी खेलन, नित गारी नित ही हँसिया॥ [1]
माथे मुकुट लकुट लीनें कर, पीत पिछौरी कटि कसिया।
हरीचन्द्र के नैंन सिरावो, राधा प्यारी कौ ये रसिया॥ [2]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, होली (13)
हे होली के रसिया श्री कृष्ण, तुम चिर काल तक जियो। तुम नित्य मेरे संग होली खेलो जिसमें नित्य ही तुम्हारे मधुर गाली एवं हँसी होगी। [1]
तुम्हारे माथे पर मोरमुकुट है एवं हाथों में लकुटी, कटी प्रदेश में सुन्दर पिछौरा कसा हुआ है। श्री हरिश्चंद्र जी कहते हैं कि "हे श्री राधा प्यारी के रसिया श्री कृष्ण, कृपया अपने दर्शन से मेरी आँखों को शीतल कीजिये।" [2]

