प्रीति की रीति कछू नहिं राखत - श्री सुंदर जी

प्रीति की रीति कछू नहिं राखत - श्री सुंदर जी

(सवैया)
प्रीति की रीति कछू नहिं राखत, जाति न पाँति नहीं कुल गारो। [1]
प्रेम के नेम कहूँ नहिं दीसत, लाज न कानि लग्यो सब खारो॥ [2]
लीन भयो हरि सों अभ्यंतर, आठ हु याम रहै मतवारो। [3]
सुन्दर कोऊ न जानि सकै, यह गोकुल गाँव को पैंड़ो ही न्यारो॥ [4]

- श्री सुंदर जी

प्रेम का मार्ग सब बंधनों को तोड़ देता है—न जाति, न पंथ, न कुल की परछाई तक रह पाती है। [1]

जहाँ नियम, रीति, और लोकाचार सब मिट जाते हैं; वहाँ केवल प्रेम का साम्राज्य बसता है। [2]

भक्त इस गली में प्रवेश करते ही श्रीकृष्ण प्रेम में ऐसा डूबता है कि वह मतवाला सा हो जाता है। उसे दिन-रात का भान नहीं रहता। [3]

श्री सुंदरदास जी कहते हैं—गोकुल की इस अनोखी राह को वही जानता है, जिसने स्वयं प्रेम का अनुभव किया हो। [4]