व्यास रसिक सब चलि बसे नीरस रहे कुवंश - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (98)

व्यास रसिक सब चलि बसे नीरस रहे कुवंश - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (98)

व्यास रसिक सब चलि बसे, नीरस रहे कु-वंश ।
वग ठगकी संगति भई, परिहरि गए जु हंस ॥

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (98)

श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि वास्तविक रसिक (प्रेमी) तो सब चले गए, अब तो केवल नीरस हृदय वाले कुवंश ही बचे हैं मानो निर्मल सरोवर के राजहंस छल-कपट से भरे बगुलों की संगति त्यागकर दूर चले गए हों।