छाँड़ जग जालन के - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (90)

छाँड़ जग जालन के - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (90)

(कवित्त)
छाँड़ जग जालन के ख्याल तें रँगीले हाल,
जाकी लै सरन जहाँ काहु के न डर हैं। [1]
दारा तात जननी सजाती जात जेते जान,
तेते जान घाती सिद्ध कारज हरन हैं॥ [2]
दास कहैं चेत दयासिन्धु तें लगाय हेत,
रहिये निकेत अघ दल के दरन हैं। [3]
धीरज धरन हारे ऐसे ना निहारे जैसे,
तारन तरन राधारानी के चरन हैं॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (90)

जगत के जंजाल को छोड़कर श्री राधारानी के चरण कमलों की शरण ग्रहण करो, जहाँ कोई भी भय नहीं रहता। [1]

यह जान लो कि पति, पत्नी, माता, पिता, कुटुंबीजन और अन्य सगे-संबंधी सब स्वार्थी हैं। वे तुम्हें तुम्हारे परम लक्ष्य (भगवद्प्राप्ति) से दूर ले जाने वाले हैं। [2]

श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि अब तू होश में आ जा और परम कृपाल स्वामिनी जू (श्री राधा) के चरणों से प्रेम कर ले, क्योंकि वे श्रीचरण ही ऐसे हैं जो समस्त पापों के समूह को सदा नष्ट करने वाले हैं। [3]

संसार सागर से तारने वाले श्री राधा महारानी जू के चरण कमलों को निहारकर, परम धैर्यवान भी अपना धीरज ऐसे खो बैठते हैं जैसे उन्होंने इन चरणों का कभी दर्शन ही न किया हो। [4]