लीला :
छटीकरा के पास स्थित इस स्थान पर श्री कृष्ण की विभिन्न लीलाएं संपन्न हुई। एक दिन, गायों को चराते समय, श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ लीला करने लगे। सबको लीला समझते हुए श्री कृष्ण ने श्रीदामा सखा को गरुड़ की भूमिका सौंपी, जिसके बाद वे श्रीदामा की पीठ पर चढ़ गए, और गरुड़ पर सवार लक्ष्मीपति नारायण के समान दिखने लगे। आज भी, भक्तगण गोविंद जी के उस दिव्य झांकी का दर्शन करते हैं, जिसमें श्रीदामा सखा गरुड़ की भूमिका निभाते हैं।
यह स्थान भगवान राम की लीलाओं से भी सम्बंधित है। जब मेघनाथ द्वारा भेजे गए सर्पों ने श्री रामचन्द्र को अपनी कुंडली में जकड़कर उन्हें असहाय बना दिया, तब नारद मुनि ने गरुड़ जी को इस स्थिति से अवगत कराया। गरुड़ जी उसी क्षण यहाँ घटनास्थल पर पहुंचे, उनको देखते ही सर्पों ने श्री रामचंद्र जी को छोड़ दिया और डर से भागने लगे। इस घटना ने गरुड़ जी के ह्रदय में संदेह प्रकट कर दिया कि वास्तविक में श्री राम जी परमपुरुषोत्तम भगवान हैं या नहीं। कालांतर में महान भक्त श्री काकभुशुण्डि जी के सतसंग से और द्वारपर युग में श्री कृष्ण दर्शन से, गरुड़ जी का संदेह दूर हो गया। एक अवसर पर, श्री कृष्ण गरुड़ जी पर सवार हुए और स्वयं भगवान के रूप में अपनी दिव्य स्थिति की पुष्टि की।
गरुड़-गोविंद वह स्थान है जहां गरुड़ जी को श्री गोविंद के दर्शन हुए थे, जो गायों और ग्वालों के पालक हैं।
गरुड़ गोविंद जी की स्थापना :
श्री गरुड़ गोविंद जी की स्थापना आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व हुई थी, जिसका श्रेय मथुरादिपति श्री वज्रनाभ जी को दिया जाता है, जो भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र और अनिरुद्ध जी के पुत्र हैं। श्री वज्रनाभ जी ने आचार्य गर्ग मुनि के मार्गदर्शन से ही इस मंदिर की स्थापना की थी, जिसमें भगवान गरुड़ गोविंद जी और देवी लक्ष्मी जी को उस समय प्रतिष्ठित किया गया था।
भगवान गरुड़ गोविंद जी का स्वरूप:
गरुड़ गोविंद मंदिर के भीतर, भगवान गोविंद जी, जिन्हें भगवान नारायण के नाम से भी जाना जाता है, गरुड़ जी की पीठ पर बैठे हुए हैं। श्री कृष्ण की दोनों पटरानियां, सत्यभामा और रुक्मिणी जी की मनोहर छवि भगवान के चरणों में स्थित है। इस पवित्र मंदिर में भगवान नारायण को बारह भुजाओं के साथ चित्रित किया गया है। इसके अलावा, इस मंदिर के साथ एक प्राचीन कहावत भी जुड़ी हुई है-
आठ हाथ को मंदिर, जामे बारह हाथ को ठाकुर।
मंदिर आठ हाथ ऊँचा है जिसमें बारह हाथ ऊँचे ठाकुर जी हैं।
लक्ष्मी जी भगवान गोविंद के बाईं ओर विराजमान हैं। गरुड़ जी के प्रभाव से इस मंदिर में सर्प दोष और कालसर्प योग का निवारण और अनुष्ठान किया जाता है जो विश्व भर में प्रसिद्ध है।
स्थान :
श्री गरुड़ गोविन्द मंदिर वृन्दावन से 7 km दक्षिण में मथुरा-दिल्ली राजमार्ग पर छटीकरा के निकट स्थित है।

