(राग बसन्त)
विहरत विपिन भरत रंग ढुरकी।
हरषि गुलाल उडाइ लाडिली, सम्पति कुसमाकरकी॥ [1]
कसुंभी सारी सोधें भीनी, ऊपर बंदन भुरकी।
चोली नील ललित अञ्चल चल, झलक उजागर उरकी॥ [2]
मृदुल सुहास तरल दृग कुंडल, मुख अलकावलि रुरकी।
श्रीनागरीदासि केलि सुख सनि रही, मैंन ललक नहिं मुरकी॥ [3]
- श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (48)
श्रीवृंदावन में नित्यविहार-परायण लाड़िली (श्री राधा) प्रसन्न होकर लाल (श्री कृष्ण) पर प्रेम-रंग की वर्षा कर रही हैं। हर्ष से भरकर उन्होंने कुसुम-पराग रुपी गुलाल हाथों में भरकर आकाश में उड़ा दिया है। [1]
श्री राधा ने सुन्दर एवं सुवासित कसूँभी साड़ी श्रीअंग में धारण कर रखी है जिस पर झलमल-झलमल चमकता बदन सुशोभित हो रहा है। आँचल के किञ्चित चलायमान होने से उन्नत उरोजों की झलक यदा कदा उजागर हो उठती है। [2]
उनकी मंद मुस्कान सहज मनोहारिणी है। चपल नेत्रों और कपोलों के समीप हिलते-डुलते कुण्डलों की शोभा विलक्षण है। मुखारविन्द पर ढुलक आयी अलकावलि अद्वितीय रूप से सुशोभित हो रही है। श्री नागरीदेव जी कहते हैं कि नित्य केलि-सुख में निमग्न श्यामा प्यारी की 'प्रेम-ललक' घटती नहीं, अपितु पलपल बढ़ती ही रहती है। [3]
विहरत विपिन भरत रंग ढुरकी।
हरषि गुलाल उडाइ लाडिली, सम्पति कुसमाकरकी॥ [1]
कसुंभी सारी सोधें भीनी, ऊपर बंदन भुरकी।
चोली नील ललित अञ्चल चल, झलक उजागर उरकी॥ [2]
मृदुल सुहास तरल दृग कुंडल, मुख अलकावलि रुरकी।
श्रीनागरीदासि केलि सुख सनि रही, मैंन ललक नहिं मुरकी॥ [3]
- श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (48)
श्रीवृंदावन में नित्यविहार-परायण लाड़िली (श्री राधा) प्रसन्न होकर लाल (श्री कृष्ण) पर प्रेम-रंग की वर्षा कर रही हैं। हर्ष से भरकर उन्होंने कुसुम-पराग रुपी गुलाल हाथों में भरकर आकाश में उड़ा दिया है। [1]
श्री राधा ने सुन्दर एवं सुवासित कसूँभी साड़ी श्रीअंग में धारण कर रखी है जिस पर झलमल-झलमल चमकता बदन सुशोभित हो रहा है। आँचल के किञ्चित चलायमान होने से उन्नत उरोजों की झलक यदा कदा उजागर हो उठती है। [2]
उनकी मंद मुस्कान सहज मनोहारिणी है। चपल नेत्रों और कपोलों के समीप हिलते-डुलते कुण्डलों की शोभा विलक्षण है। मुखारविन्द पर ढुलक आयी अलकावलि अद्वितीय रूप से सुशोभित हो रही है। श्री नागरीदेव जी कहते हैं कि नित्य केलि-सुख में निमग्न श्यामा प्यारी की 'प्रेम-ललक' घटती नहीं, अपितु पलपल बढ़ती ही रहती है। [3]

