यस्याः स्फुरत्पदनखेन्दुततिच्छटाया माधुर्यसाररसकोटिमहाब्धिसृष्टि:।
सा चेत् कदापि कमपि स्वदृशापि पश्येत् धन्यः स तस्य विरसे खलु भुक्तिमुक्ती॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (7.90)
जिसके चमकते हुए श्रीचरण-नख-चन्द्रों की छवि की छटासे (क्षणभरमें) माधुर्य-सार-रसके करोड़ों महासमुद्रों की सृष्टि हो जाती है, वह श्रीराधा यदि कभी किसी जीवपर अपनी कृपा दृष्टि डाल दें तो वह धन्य हो जाय। (इसकी पहचान यह है कि उस जीवके लिये भुक्ति और मुक्ति दोनों नीरस हो जाती हैं, वह उन्हें चाहता ही नहीं)।
सा चेत् कदापि कमपि स्वदृशापि पश्येत् धन्यः स तस्य विरसे खलु भुक्तिमुक्ती॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (7.90)
जिसके चमकते हुए श्रीचरण-नख-चन्द्रों की छवि की छटासे (क्षणभरमें) माधुर्य-सार-रसके करोड़ों महासमुद्रों की सृष्टि हो जाती है, वह श्रीराधा यदि कभी किसी जीवपर अपनी कृपा दृष्टि डाल दें तो वह धन्य हो जाय। (इसकी पहचान यह है कि उस जीवके लिये भुक्ति और मुक्ति दोनों नीरस हो जाती हैं, वह उन्हें चाहता ही नहीं)।

