चढ़ि कै मैन तुरंग पर - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (47)

चढ़ि कै मैन तुरंग पर - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (47)

चढ़ि कै मैन तुरंग पर, चलिबौ पावक माँहि।
प्रेम-पंथ ऐसौ कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं॥

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (47)

मोम के अश्व पर बैठ कर धधकती हुई अग्नि ज्वाला में से होकर निकल जाना जितना कठिन है, उतना ही कठिन है, प्रेम-मार्ग पर चलना। प्रायः इस पथ का निर्वाह सब से नहीं हो पाता।