लालन मन राग भाल बैंदी लाल - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (5)

लालन मन राग भाल बैंदी लाल - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (5)

लालन मन राग भाल बैंदी लाल।
कुंचित कच छबि देत छबीली,
नवल चंद पच्यौ मानौं बादर जाल॥ [1]
मानौं भृकुटि-लता पाक्यौ मुख,
सर फूल्यो पहुप मृनाल। [2]
प्रियकर कृत सोभित जै श्री वंशीअलि,
मनौं मुख राजत मदन मराल॥ [3]

- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (5)

श्री लालजी (कृष्ण) का मन श्री राधा के भाल पर विराजमान बिंदी से आसक्त है।
लाड़िली श्री राधा की घुंघराली अलकावलि उनके मुख पर ऐसी प्रतीत होती है मानो चंद्र बादलों के जाल से घिरा हो। [1]

श्री राधा के मुख-कमल के सरोवर में जैसे भृकुटि की परिपक्व लता पर नेत्र रुपी कमल का पुष्प खिला हो। [2]

श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि प्रियतम श्री कृष्ण के कर-कमलों में श्री लाड़िली जी ऐसे विराजती हैं जैसे मूर्तिमान प्रेम ही राजहंस रूप में विराजमान हो। [3]