श्री अभयराम जी की जीवनी

श्री अभयराम जी की जीवनी

जन्म:
श्री अभयराम जी की जन्म तिथि का ठीक-ठीक पता नहीं चलता पर अन्तः साक्ष्य एवं वंश परम्परा के आधार पर ज्ञात होता है कि इनका जन्म 1830-1835 ईसवी के आसपास हुआ होगा।

परिचय:
श्री अभयराम जी जाति के गौरए ठाकुर थे। ये श्री वृन्दावन के दुसायत मुहल्ले में रहते थे। उस समय के बड़े-बड़े ज़मीनदारों में मुखिया के रूप में देखे जाते थे। कवि-गोष्ठियों में इनका बहुत सम्मान था। इनके अनेक पद वृन्दावन वासियों को बहुत प्रिय हैं और आज भी बड़े उत्साह से गाये जाते हैं।

दीक्षा:
श्री अभयराम जी जगद्गुरु निम्बार्काचार्य श्री 'श्रीजी' श्री निम्बार्कशरण देवाचार्य जी के शिष्य थे।

रचना:
श्री अभयराम जी ने अनेक पदों की रचना की है जो ‘श्रीवृन्दावन रहस्य-विनोद' ग्रन्थ में संकलित है जिसके तीन अनुभाग हैं। इस पुस्तक में वृंदावन से संबंधित हर वस्तु एवं प्राणी की वंदना की गई है । इसमें वृन्दावन के गोपीश्वर महादेव, वृन्दादेवी, काली मर्दन, मदनगोपाल, युगलबिहारी, मनमोहन, कुञ्जविहारी, राधामोहन, दूसरे कुञ्जविहारी, राधामाधव, राधाकान्त, राधावल्लभ, अटलबिहारी (नागाजी की कुञ्ज, बिहारघाट) रसिकविहारी, जुगलकिशोर, छैलचिकनियां, गंगामोहन, चीरविहारी, नवलगोबिंद, यशोदानन्दन, राधारमण, साखी गोपाल, चतुरशिरोमणि आदि अनेक मंदिरों की चर्चा है। इनके अध्ययन से इन मंदिरों की तत्कालीन स्थिति का परिचय भी मिलता है।

वृद्ध माताओं के प्रति भाव:
साधकों में सर्वप्रथम श्री अभयराम जी की दृष्टि उन डुकरियों (वृद्ध माताओं) की ओर जाती है जो अत्यन्त वृद्ध हैं, अकिंचन हैं। ठंड में भी सिकुड़ती हुई नित्य यमुना स्नान करने जाती हैं। ऐसी दीखती हैं मानों एक-दो दिन में ही इनका देहावसान हो जायेगा -

धन धन वृन्दावन की डुकरियां।
प्रात होत जमुना को जायें, सुकरी जाँय सुकरियां॥
आसन बासन घर में नाहीं, नाहीं हँडिया परियां।
अभयराम ये हू बड़भागिनि, इनकी त्यार लकरियां॥
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (54)

श्री वृन्दावन की वृद्ध माताएं धन्य हैं, जो प्रातः काल ही सिकुड़ते हुए यमुना स्नान करने जाती हैं। इनके घरों में न कोई वस्त्र है न पात्र, लेकिन फिर भी ये बड़ी भाग्यशाली हैं क्योंकि ये श्री वृन्दावन की रज में ही शरीर त्याग करेंगी।

वृन्दावन के प्रति श्रद्धा:
श्री नागरीदास जी के 'वन-जन-प्रशंसा' ग्रन्थ की शैली में श्री अभयराम जी ने भी वृन्दावन के चींटी जैसे तुच्छ से तुच्छ प्राणियों तक की प्रशंसा में अनेक पद बनाये हैं, जिससे इनके वृन्दावन के प्रति अटूट प्रेम का परिचय प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए -

एक व्रज-रेणुका पै चिन्तामनि वारि डारों,
लोकन को वारों सेवाकुञ्ज के विहार पै।
लतन की पातन पै कल्पवृक्ष वारि डारों,
रम्भाहू को वारि डारों गोपिन के द्वार पै॥
व्रज पनिहारिन पै शची रती वारि डारों,
बैकुण्ठहिं वारि डारों कालिन्दी धार पै।
कहैं अभयराम एक राधेजू को जानत हौं,
देवन को वारि डारौं नन्द के कुमार पै॥
- श्री अभयराम

अनगिनत इच्छा-पूर्ति चिन्तामणियों को ब्रज की रज के एक कण पर न्यौछावर किया जा सकता है। वृंदावन के सेवा कुंज के विहार पर पूर्ण विश्व को वारा जा सकता है। इच्छा पूर्ति करने वाले अनगिनत कल्प वृक्षों को ब्रज की लता पता पर वारा जा सकता है। अप्सराओं की रानी ‘रम्भा' को गोपियों के द्वार पर न्यौछावर कर दो। कामदेव की पत्नी ‘रति' और इंद्र की पत्नी (स्वर्ग की रानी) ‘सचि' को ब्रज की पनिहारिन (जो ब्रज में पानी भरने की सेवा करती हैं ) पर न्यौछावर कर दो। भगवान् नारायण का पूरा वैकुण्ठ धाम ही न्यौछावर कर दिया जा सकता है यमुना रसरानी पर। 'श्री अभय राम' कहते हैं, "मेरी आराध्या एकमात्र श्री राधा हैं, मैं उनके अतिरिक्त किसी और को सपने में भी नहीं  जानता, और नंद के पुत्र श्री कृष्ण पर समस्त भगवान् के अवतारों को ही न्यौछावर किया जा सकता है (जो स्वयं श्री राधारानी की शरण में हैं )।"

श्री अभयराम जी का श्री यमुना जी एवं वृन्दावन की लताओं से प्रेम:

धन धन वृन्दावन की लता प्यारी।
फूले कदम माधुरी लपटी कोयल बोलत कारी॥ [1]
छहौ राग छत्तीस रागिनी कुञ्ज कुञ्ज उच्चारी।
अभयराम रज वनकी महिमा देखत हैं पियप्यारी॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (1)

श्री वृन्दावन की प्यारी-प्यारी लताएं धन्य हैं, जो खिले हुए पुष्पों से भरी हुई कदम्ब वृक्ष से लिपटी है, जिसपर कोयल बैठकर मधुर शब्द कर रहा है। [1]
श्री अभयराम जी कहते हैं कि "श्री वृन्दावन कि लता कुञ्जों में समस्त राग-रागिनियाँ गान कर रहे हैं, ऐसे सुन्दर श्री वृन्दावन के रज की शोभा को श्री राधाकृष्ण निहार रहे हैं। [2]

धन धन वृन्दावन जमुना जल पानी।
उठै तरंग अङ्ग सों लागे कटै पाप ज्यों घानी॥
साधु संत अस्नान करत हैं भजन करत हैं ज्ञानी।
अभयराम रज वनकी महिमा आप करी पटरानी॥
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (2)

श्री वृन्दावन में प्रवाहमान श्री यमुना जी धन्य हैं, जिनकी उठती तरंगे अंगों का स्पर्श कर उन्हें समस्त पापों से मुक्त कर देती हैं। समस्त साधु, वैष्णव, एवं ज्ञानीजन इसी में स्नान कर भजन में उन्नति को प्राप्त होते हैं। श्री अभयराम जी कहते हैं कि "श्री वृन्दावन के रज में प्रवाहित श्री यमुना जी श्री कृष्ण की पटरानी हैं, जिसकी महिमा अपार है।"

श्री वृन्दावन के मोर एवं चींटी के भाग्य की सराहना :

धन धन वृन्दावन के मोर।
कुञ्जन ऊपर नृत्य करत हैं जिनको देखैं नन्द किसोर॥ [1]
जिनकी बोली लगै सुहाई कूंकैं निशदिन हरि की ओर।
अभयराम ऐहू बड़भागी इनके दरसन कीजै भोर॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (62)

श्री वृन्दावन के मोर धन्य हैं, जो कुंजों के ऊपर नृत्य करते हैं एवं जिन्हें श्री कृष्ण देखते हैं। [1]
इनकी बोली बड़ी सुहावनी लगती है, जो निशिदिन हरि की ओर मुख करके कुहुकते हैं। श्री अभयराम कहते हैं "वृन्दावन के मोर बड़े भाग्यवान हैं, नित्य इनके भोर में दर्शन किया करो।" [2]

धन धन वृन्दावन की चैंटी।
महाप्रसाद को किनका लैके जाय भिले में बैठी॥ [1]
है गयो ज्ञान ध्यान हृदय में व्याधि जन्म की मैटी।
अभयराम येहूं बड़भागिनि रज में रहैं लपेटी॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (74)

धन्य है वृंदावन की चींटी जो महाप्रसाद का कण लेकर बिल में बैठ कर खाती है। [1]
जिसके माध्यम से यह जन्म और मृत्यु की व्याधि को नष्ट कर, भीतर से ज्ञान एवं ध्यान को प्राप्त करती है। श्री अभयराम कहते हैं, "वृंदावन की चींटी कितनी धन्य है क्योंकि यह वृंदावन की रज से ही लिपटी रहती है"। [2]

श्री वृन्दावन के संतों से प्रेम:

धन धन वृंदावन के विरक्त सन्त।
प्रात होय जमुना में न्हावैं, आछे रज सेवत॥ [1]
ब्रज वासिन के टुकड़ा पावैं, भोजन करैं एकन्त।
अभयराम ऐ तो बड़भागी, ये सन्तन के सन्त॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (82)

श्री वृंदावन धाम के विरक्त संत धन्य धन्य हैं। सुबह होते ही यह संत श्री यमुना जी में नहाते हैं एवं यहाँ की परम पावन रज का सेवन करते हैं (एवं अपने अंगों पर धारण करते हैं)। [1]
ब्रज वासियों द्वारा टुकड़े पाते हैं एवं एकांत में भोजन करते हैं। श्री अभयराम जी कहते हैं कि यह अत्यंत भागश्याली हैं, एवं समस्त संतों के भी यह संत हैं। [2]

निकुंजगमन :
श्री अभयराम जी ने अपने समय के वृन्दावन के प्रायः सभी मन्दिरों का वर्णन किया है पर श्रीजी मंदिर (निर्माणकाल 1883 ईसवी), रंग-मन्दिर (निर्माणकाल 1909 ईसवी) जैसे विशाल मंदिरों की कोई चर्चा नहीं की है, जिससे प्रतीत होता है कि इनका देहावसान 1880 ईसवी के आस-पास या इससे भी कुछ वर्ष पूर्व हो चुका होगा।