खेलत दोऊ कुंजन होरी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

खेलत दोऊ कुंजन होरी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

खेलत दोऊ कुंजन होरी।
मूठ गुलाल उडावत सजनी,
ढोरत रंग कमोरी। [1]
बाजत चंग मृदंग सारंगी,
गावत हैं मिल गौरी॥ [2]
पिचकारी बोछारन बरसत,
फेंकत बूकन झोरी। [3]
रामसखी मेरे नैनन बसोरी,
नवल किशोर की जोरी॥ [4]

- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

श्री राधा कृष्ण कुंज में होली खेल रहे हैं। श्री राधा मुट्ठी भर-भरकर गुलाल उड़ा रही हैं और रंग से भरा घड़ा बहा रही हैं। [1]

सखियां ढोलक, मृदंग और सारंगी बजाकर राग गौरी में मधुर गीत गा रही हैं। [2]

चारों ओर से पिचकारी की बौछार बरस रही है, सखियां झोली भर-भरकर अबीर फेंक रही हैं। [3]

श्री रामसखी जी कहते हैं कि नवल किशोर श्री श्यामाश्याम की यह अद्भुत जोड़ी सदैव मेरी आँखों में बसी रहे। [4]