जहि विषय दुर्विषवनं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.3)

जहि विषय दुर्विषवनं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.3)

जहि विषय दुर्विषवनं छिन्दि दुराशा महा पाशान।
अयि मति विहंगि याया अमृतं वृन्दावन समुड्डीय॥

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.3)

हे मति रूप पक्षिनि! विषय के जहरीले वन को त्याग कर दुराशाओं के पाशों को काट डाल, अमृत स्वरूप श्रीवृन्दावन में ही उड़ चलना तुम्हें उचित है।