कह जानो कहँवा मुवो, ऐसे कुमति कुमीच। हरि सों हेत बिसारिके, सुख चाहत है नीच॥ - श्री सूरदास, सूर सागर न जाने यह कुमति बुद्धि वाला दुष्ट जीव कैसी मौत मरेगा जो श्री हरि की भक्ति एवं प्रेम को छोड़ कर भी सुख चाहता है ।