बंदौ श्री पद पद्म उदार - श्री वल्लभ दास

बंदौ श्री पद पद्म उदार - श्री वल्लभ दास

बंदौ श्री पद पद्म उदार। [1]
रास सुधा सागर छवि आगर, भक्ति भाव भण्डार।
जे पद पद्म नाह उर संपुट, वसत सदा सुकुमार॥ [2]
जे पद कुंज पुंज में विहरत, वृन्दावन श्रृंगार।
जे पद पद्म पुनीत परम फल, रसिकनी प्राण आधार॥ [3]
जे पद पद्म भाल हरि धर के, पायो सुयश अपार।
जे पद पद्म प्रणत पथ पालन, ब्रह्म तत्व सुखदार॥ [4]
श्री गिरिधरन लाल ठकुरानी, बंदौ बार ही बार।
दीन 'दासवल्लभ' शरणागत, ठाडो वृष रवि द्वार॥ [5]

- श्री वल्लभ दास

श्री राधारानी के उदार चरण कमलों कि मैं वंदना करता हूँ। [1]

श्री राधा के श्री चरण सदैव रास लीला के सुधा-सागर में अग्रगण्य रहते हैं एवं भक्ति भाव प्रदान करने वाले भण्डार हैं। जो श्री कृष्ण के ह्रदय कमल में सदैव बसे रहते हैं, उन चरण कमलों कि मैं वंदना करता हूँ। [2]

जो श्री चरण वृन्दावन की कुंजों में विचरण करते हैं, जिनके चिन्हों से समस्त वृन्दावन श्रृंगारित है, जो परम फल स्वरुप हैं तथा रसिकों के प्राणों का आधार हैं, उन चरण कमलों कि मैं वंदना करता हूँ। [3]

जिन श्री चरणों को मस्तक पर धारण करने से श्री हरि को अपार सुयश प्राप्त हुआ है, जिन श्री चरणों में आनंद को प्रदान करने वाले परम ब्रह्म भी प्रणाम करते हैं, उन चरण कमलों कि मैं वंदना करता हूँ। [4]

श्री वल्लभदास जी कहते हैं कि "हे लाल श्री गिरिधर की प्राण-प्यारी ठकुरानी श्री राधा, मैं दीन आपका शरणागत आपके द्वार पर खड़ा हूँ जिस द्वार पर सब अपना मस्तक झुकाते हैं ।" [5]