(राग विहागरो)
होरी खेलनि स्याम हुलसि छबीली आई।
अबीर गुलाल लिएँ नैननि में, आजु करत मन भाई॥ [1]
बाजे बजत दुहुँ दिसि नीके, मनमथ मोद बढ़ाई।
छबि तरंग छूटत पिचकारी, भृकुटिन मार मचाई॥ [2]
गावत गीत रस-रीति जीति के, पुलकि किलकि सुखदाई।
श्रीरसिकबिहारिनि की छवि निरखत, ज्यों दामिनि घन छाई॥ [3]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (21)
श्री श्यामसुंदर के संग होली खेलने के लिए उल्लास से भरी हुई छबीली श्याम प्यारी (श्री राधा) आयी हैं । अपने नेत्रों में अबीर एवं गुलाल रूपी प्रेम रंग भरकर, आज यह अपने मनभाया कर रही हैं । [1]
दोनों ओर विचित्र प्रकार के बाजे बज रहे हैं; जिनसे अनंग का रंग और गहरा होता जा रहा है। श्रीयुगल के श्रीअंगों से छवि-तरंगों की पिचकारियाँ छूट रही हैं। कुटिल कटाक्षों की मार मची हुई है। [2]
जीत के उल्लास में उज्ज्वल रस-रीति के गीत गाये जा रहे हैं। अंग-अंग पुलकित हो रहे हैं। किलकारियों के रूप में आनंद की फुहारें झर रही हैं। श्री रसिकदेव जी कहते हैं कि प्रिया-प्रियतम की छवि को देखकर आज ऐसा लग रहा है, मानो घनश्याम पर दामिनी छा गई है। [3]
होरी खेलनि स्याम हुलसि छबीली आई।
अबीर गुलाल लिएँ नैननि में, आजु करत मन भाई॥ [1]
बाजे बजत दुहुँ दिसि नीके, मनमथ मोद बढ़ाई।
छबि तरंग छूटत पिचकारी, भृकुटिन मार मचाई॥ [2]
गावत गीत रस-रीति जीति के, पुलकि किलकि सुखदाई।
श्रीरसिकबिहारिनि की छवि निरखत, ज्यों दामिनि घन छाई॥ [3]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (21)
श्री श्यामसुंदर के संग होली खेलने के लिए उल्लास से भरी हुई छबीली श्याम प्यारी (श्री राधा) आयी हैं । अपने नेत्रों में अबीर एवं गुलाल रूपी प्रेम रंग भरकर, आज यह अपने मनभाया कर रही हैं । [1]
दोनों ओर विचित्र प्रकार के बाजे बज रहे हैं; जिनसे अनंग का रंग और गहरा होता जा रहा है। श्रीयुगल के श्रीअंगों से छवि-तरंगों की पिचकारियाँ छूट रही हैं। कुटिल कटाक्षों की मार मची हुई है। [2]
जीत के उल्लास में उज्ज्वल रस-रीति के गीत गाये जा रहे हैं। अंग-अंग पुलकित हो रहे हैं। किलकारियों के रूप में आनंद की फुहारें झर रही हैं। श्री रसिकदेव जी कहते हैं कि प्रिया-प्रियतम की छवि को देखकर आज ऐसा लग रहा है, मानो घनश्याम पर दामिनी छा गई है। [3]

