अनन्यनि कौनकी परवाहि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (176)

अनन्यनि कौनकी परवाहि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (176)

(राग सारंग)
अनन्यनि कौनकी परवाहि।
कुंज-विहारीकी आसा करि, लै कमरी करवाहि॥ [1]
कोटि मुकुति सुख होत गोखरू,जबै गड़ै तरवाहि।
(श्री) वृन्दावनके देखत भाजै नैननिकी हरवाहि॥ [2]
जमुना कूल फूल फल फूलत, गोरस की भरवाहि।
निसिदिन स्याम कामवस सेवत, राधाकी घरवाहि॥ [3]
रीझत जाहि राजसी जब तब, मारत पाथर वाहि।
इतनी आस व्यास तजि भजिये, गुदी बाँधि सरवाहि॥ [4]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (176)

श्री राधा कृष्ण के अनन्य रसिकों को किसी की परवाह नहीं होती । वे तो कंधे पर कंबल एवं हाथ में करुवा लिए, नित्य श्री कुञ्जबिहारी की ही अनन्य आशा बनाये रखते हैं । [1]

श्री ब्रज की भूमि के जब काँटे भी उनके तलवों में चुभते हैं तो उसका सुख भी कोटि कोटि मुक्ति के समान उनको प्रतीत होता है । श्री वृन्दावन का दर्शन करते ही उनकी आँखों के ताप का शमन हो जाता है। [2]

श्री यमुना पुलिन पर सुन्दर पुष्प एवं फल फूले हुए हैं, एवं यहाँ गोरस की अधिकता है। श्री कृष्ण निशिदिन प्रेम के वश में श्री राधा के महल में उनकी चाकरी करते हैं। [3]

यदि वृंदावन में वास करते हुए भी हृदय में राजसी सुख प्राप्ति की लालसा हो, तो यह धिक्कार योग्य है। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि श्रीधाम वृंदावन में समस्त सांसारिक आशाओं का त्याग कर, भजन पारायण होकर, पूर्ण निश्चिंतता पूर्वक रहना चाहिए। [4]