मेरी प्रान सजीवन राधा - श्री सुंदरी कुंवरी जी

मेरी प्रान सजीवन राधा - श्री सुंदरी कुंवरी जी

मेरी प्रान सजीवन राधा।
कब तो बदन सुधाधर दरसै, मो अखियन हरै बाधा॥ [1]
ठमकि ठमकि लरिकौहीं चालन, आय समुहैं मेरे।
रस के बचन पियूष पोषिकै, कर गहि बैठउ नेरे॥ [2]
रस महल संकेत युगल कै, टहलिन करहूं सहेली।
आग्या लहौं रहौं तँह ततपर, बोलत प्रेम पहेली॥ [3]
मन मंजरि जू कीन्हौं किंकरि, अपनाबहु किन वेग।
‘सुन्दरकुँवरि’ स्वामिनी राधा, हिय की हरउ उदेग॥ [4]

- श्री सुंदरी कुंवरी जी

हे मेरे प्राणों की संजीवनी, श्री राधा, आप कब मुझे अपने सुंदर वदन-कमल का दर्शन देकर मेरी आँखों की बाधा का हरण करेंगी? [1]

हे किशोरी, ठुमक-ठुमक कर चलते हुए अपनी सखियों के साथ कब मेरे पास आएंगी? अपनी सुंदर रसीली वाणी द्वारा मेरे हृदय का पोषण कर कब मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपने निकट बैठाएंगी? [2]

हे श्री राधा, मुझे अपनी दासी समझकर, रस से परिपूर्ण अपने युगल संकेत महल में कब निवास प्रदान करेंगी? वहां मैं नित्य आपकी आज्ञा का पालन करते हुए सेवा में तत्पर रहूंगी और आपसे प्रेममयी वार्ता करूंगी। [3]

श्री सुंदरकुंवरी जी कहती हैं, "हे स्वामिनी श्री राधा, मुझे अपनी किंकरी बनाकर मुझे शीघ्र अपना लीजिए और मेरे हृदय के उद्वेग का हरण कीजिए।" [4]