(राग मरवा व भूपाली)
श्री बन उज्जवल रस की खान ।
चहुँ दिशि श्री राधे धुनि सुनियत,
करत जमुन जल पान ॥ [1]
लाल लली की लाड़ चाव की,
होय कथा सुखदान ।
पिय प्यारी रीझैँ जब अतिशय,
तबहि बसे यहाँ आन ॥ [2]
सुकृत उदय होंय जन्मन के,
उपजे जगत गिलान ।
“रूपमाधुरी" वृंदावन बसि,
करे जुगल गुन गान ॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (139)
श्री धाम वृंदावन उज्जवल रस की ख़ान है । यहाँ चारों ओर केवल “श्री राधे” की सुंदर ध्वनि ही सुनायी देती है तथा यमुना जी का जल पीने को प्राप्त है । [1]
यहाँ लाड़ली लाल (राधा कृष्ण) को लाड़ लड़ाने वाली आनंद प्रदान करने वाली कथा होती रहती है । जब श्री राधा कृष्ण अति ही प्रसन्न होते हैं तभी वे किसी जीव को श्री धाम वृंदावन का वास प्रदान करते हैं । [2]
यदि अनंत जन्मों के सुकृत उदय होते हैं तो सांसारिक प्रपंचों एवं वासनों से घृणा उत्पन्न होती है । श्री रूप माधुरी जी कहते हैं कि यदि वृंदावन का वास प्राप्त हो जाये तो युगल का नित्य गुणगान करना चाहिए। [3]
श्री बन उज्जवल रस की खान ।
चहुँ दिशि श्री राधे धुनि सुनियत,
करत जमुन जल पान ॥ [1]
लाल लली की लाड़ चाव की,
होय कथा सुखदान ।
पिय प्यारी रीझैँ जब अतिशय,
तबहि बसे यहाँ आन ॥ [2]
सुकृत उदय होंय जन्मन के,
उपजे जगत गिलान ।
“रूपमाधुरी" वृंदावन बसि,
करे जुगल गुन गान ॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (139)
श्री धाम वृंदावन उज्जवल रस की ख़ान है । यहाँ चारों ओर केवल “श्री राधे” की सुंदर ध्वनि ही सुनायी देती है तथा यमुना जी का जल पीने को प्राप्त है । [1]
यहाँ लाड़ली लाल (राधा कृष्ण) को लाड़ लड़ाने वाली आनंद प्रदान करने वाली कथा होती रहती है । जब श्री राधा कृष्ण अति ही प्रसन्न होते हैं तभी वे किसी जीव को श्री धाम वृंदावन का वास प्रदान करते हैं । [2]
यदि अनंत जन्मों के सुकृत उदय होते हैं तो सांसारिक प्रपंचों एवं वासनों से घृणा उत्पन्न होती है । श्री रूप माधुरी जी कहते हैं कि यदि वृंदावन का वास प्राप्त हो जाये तो युगल का नित्य गुणगान करना चाहिए। [3]

