यन्नामश्रवणान्तरे निपतितं सर्व्वं मलं चेतसो हन्ति प्रीतिभरेण संश्रुतममुं जन्तुं भवादुद्धरेत्।
यद् दृष्टं वृषभानुजांघ्रिनलिनप्रोद्दामकैंकर्य्यदं तर्द्वर्य्याखिलधाम मूर्द्धसु सदा कुण्डं नरीनृत्यते॥
- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (96)
जिसका नाम कानों के भीतर प्रवेश करते ही बड़े-से-बड़े पतित के भी चित्त के समस्त मलों का नाश कर देता है तथा प्रेम के साथ शरण लेनेवाले जीवों को संसार से उद्धार कर देता हैं और जिसका दर्शन करने पर वृषभानु नन्दिनी के चरण कमलों में प्रगाढ़ कैंकर्य प्राप्त होता है, वह श्रीराधा कुंड श्रेष्ठ समस्त धामों के मस्तक पर विराजमान होकर नृत्य कर रहा है।
यद् दृष्टं वृषभानुजांघ्रिनलिनप्रोद्दामकैंकर्य्यदं तर्द्वर्य्याखिलधाम मूर्द्धसु सदा कुण्डं नरीनृत्यते॥
- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (96)
जिसका नाम कानों के भीतर प्रवेश करते ही बड़े-से-बड़े पतित के भी चित्त के समस्त मलों का नाश कर देता है तथा प्रेम के साथ शरण लेनेवाले जीवों को संसार से उद्धार कर देता हैं और जिसका दर्शन करने पर वृषभानु नन्दिनी के चरण कमलों में प्रगाढ़ कैंकर्य प्राप्त होता है, वह श्रीराधा कुंड श्रेष्ठ समस्त धामों के मस्तक पर विराजमान होकर नृत्य कर रहा है।

