मेरो मन माणिक गिरवी धरयो, श्री मनमोहन के पास।
प्रेम ब्याज इतनो बढयो, ना छूटन की आस॥
- ब्रज के दोहे
मैंने अपना माणिक रत्न रूपी मन, मनमोहन श्री कृष्ण के पास गिरवी रखा है, उसके प्रेम का ब्याज इतना बढ़ गया है कि अब उसके मुक्त होने की कोई आशा नहीं दिखती।
प्रेम ब्याज इतनो बढयो, ना छूटन की आस॥
- ब्रज के दोहे
मैंने अपना माणिक रत्न रूपी मन, मनमोहन श्री कृष्ण के पास गिरवी रखा है, उसके प्रेम का ब्याज इतना बढ़ गया है कि अब उसके मुक्त होने की कोई आशा नहीं दिखती।

