नैन भरि देखि अब भानु तनया - गोस्वामी श्री हरिराय जी

नैन भरि देखि अब भानु तनया - गोस्वामी श्री हरिराय जी

नैन भरि देखि अब भानु तनया।
केलि पिय सों करें भ्रमर तबहि परें, श्रम जल भरत आनंद मनया॥ [1]
चलत टेढी होय लेत पिय को मोहि, इन बिना रहत नहिं एक छिनया।
रसिक प्रीतम रास करत श्री यमुना पास, मानो निर्धनन की है जु धनया॥ [2]

- गोस्वामी श्री हरिराय जी

मैं अब वृषभानु नंदिनी श्री राधा को आँखे भरकर देख रहा हूँ, जो प्रियतम श्री कृष्ण के संग केलि-परायण हैं एवं जिनके श्री अंग के श्रम-जल को पान करते हुए भँवरे अपना भाग्य मनाते हुए (आनंदित होकर) मंडरा रहे हैं। [1]

श्री राधा प्रेम-रस के मद में टेढ़ी होकर चल रही हैं एवं प्रियतम को मोहित कर रही हैं, जो इनके बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते । गोस्वामी श्री हरिराय जी कहते हैं कि "रसिक प्रियतम श्री कृष्ण यमुना पुलिन पर श्री राधा के संग रास कर रहे हैं, श्री राधिका ऐसी लग रही हैं मानो यह निर्धनों की परम धन हों ।" [2]