सब संक तजी गुरू लोगन की - ब्रज के सवैया

सब संक तजी गुरू लोगन की - ब्रज के सवैया

सब संक तजी गुरू लोगन की, कुल कानकी आनन आनती हैं। [1]
करि कोटि उपाय मनावे कोउ, अपनी एक टेकहि ठानती हैं॥ [2]
'परमेस' जु और न जाने कछु, एक प्रेम को पन्थ पिछानती हैं। [3]
पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना, अखियाँ दुखिया नहिं मानती हैं॥ [4]

- ब्रज के सवैया

एक गोपी कहती है -
 गुरूजनों और कुल-परिवार की सारी मर्यादा और संकोच को मैंने त्याग दिया है। [1]

लाखों उपायों से भी कोई मुझे रोकना चाहे, अब मैं अपनी एक ही ठानी हुई प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहूँगीं । [2]

अब मैं एक प्रेम के पंथ को ही पहचानती हूँ, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं जानती। [3]

हे प्रियतम श्री कृष्ण,  तुम्हारे दर्शन के बिना अब मेरी दुःखी आँखें मानती नहीं हैं। [4]