खेलत रास लाड़िली लाल - श्री नरहरि देव जू की वाणी (11)

खेलत रास लाड़िली लाल - श्री नरहरि देव जू की वाणी (11)

(राग विहागरो)
खेलत रास लाड़िली लाल।
तान गान गुन सिखवति प्यारी, तहाँ न कोऊ बाल॥ [1]
ताल मृदंग संगीत विधि उघटत, भूषन बजत रसाल।
उरप तिरप चित लेत सुलप गति, उपजत सुख के जाल॥ [2]
केलि कला रस बरसत हरसत, परसत प्रेम बिसाल।
श्रीनरहरिदासि निकट सुख निरखत, स्याम सुभग उर माल॥ [3]

- श्री नरहरि देव, श्री नरहरि देव जू की वाणी (11)

लाड़िली-लाल श्री राधा कृष्ण रास का खेल खेल रहे हैं। प्यारी जू (श्री राधा) तान और गान प्रियतम (कृष्ण) को सिखा रही हैं। इस समय कोई भी अन्य सखी वहाँ नहीं है। [1]

संगीत के सब साज बज रहे हैं। राग-रागिनियों के सुन्दर स्वर उत्पन्न हो रहे हैं। सम्पूर्ण वातावरण में राग-रंग छा गया है। नृत्य करते समय श्री श्यामाश्याम के आभूषण बज रहे हैं जिससे संगीत के सातों स्वर उमंग से भर रहे हैं।
श्री बिहारी-बिहारिणी नृत्य में सुन्दर उरप तिरप गति ले रहे हैं जिससे सुख का जाल प्रकट हो रहा है। [2]

प्रिया-प्रियतम रस, केलि, हाव-भाव, मुस्कन , हँसन एवं चलन से हर्षित हो रहे हैं। प्रेम का सागर उमड़ रहा है।
निकट से देखते हुए श्री नरहरिदेव जी कहते हैं कि प्यारी जू प्रियतम के ह्रदय में समां गयी हैं। [3]