न त्वं वैकुंठ लोकेपि - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (49)

न त्वं वैकुंठ लोकेपि - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (49)

न त्वं वैकुंठ लोकेपि न व ते रसदा प्रिय: ।
वृंदावनाद्यते तस्माचदेवाहं गतिश्रित: ॥

- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (49)

हे श्री राधे! न आप वैकुण्ठ लोक में हैं और न आपके रस दाता प्रियतम श्री कृष्ण ही । यदि आप कहीं हैं, तो केवल श्री वृंदावन में । अतएव मैंने भी उसी श्री वृंदावन का आश्रय ग्रहण किया है ।