आराधहि मन राधा दुलहिनि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (100)

आराधहि मन राधा दुलहिनि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (100)

(राग विहागरौ)
आराधहि मन राधा दुलहिनि, जिहिं आराधत लाल विहारी। [1]
कुंज-कुंज डोलत सँग लागे, कृपा कटाक्ष करैं सुकुमारी॥ [2]
रुचि लै नैननि भौंहनि जोवत, छिन-छिन नवसत करत सँभारी। [3]
‘हित ध्रुव’ अद्भुत प्रीति निहारत, देत सखी सब प्राननि वारी॥ [4]

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (100)

हे मेरे मन ! तू श्री राधा नामक नित्य नव-वधू नवल-किशोरी की ही आराघना कर, जिनकी आराधना रसिक शेखर श्री विहारीलाल भी सदा करते हैं। [1]

वे अपनी आराध्या श्री राघा के साथ लगे हुए वृन्दावन की कुञ्ज-निकुञ्जों में इसलिए विचरण करते हैं कि सुकुमारी श्रीप्रिया मुझे अपने कृपा-कटाक्ष से कृत-कृत्य कर दें। [2]

रसिक लाल अपनी नवेली किशोरी प्रिया की रुचि अनुकूलता को प्राप्त करने के लिए किशोरी के कृपामय नेत्रों एवं भृकुटियों की ओर अपनी लालच भरी दृष्टि लगाये रहते हैं तथा क्षण-क्षण नवल किशोरी के षोडश-शृङ्गार की संरचना एवं संयोजन करते रहते हैं। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि श्रीलाल जी की इस अद्भुत प्रीति-प्रणाली का अवलोकन करके समस्त सखिजन अपने प्राणों को उन पर बलिहार करती हैं। [4]