अघासुर का उद्धार :
ब्रज में बालकृष्ण की चंचल लीलाओं के मध्य, उनके मामा कंस उन्हें समाप्त करने के लिए बार-बार असुरों को भेजते रहते थे, जैसे शकटासुर, पूतना, तृणावर्त, व्योमासुर, बकासुर, आदि। ऐसा ही एक असुर था जिसका नाम अघासुर था। यह पूतना एवं बकासुर का भाई था, जो पास के 'सेवा वन' में रहता था। अघासुर से ब्रजवासीगण अत्यंत पीड़ित थे। उसके अत्याचार से मुक्ति पाना चाहते थे, जिससे देवता भी भयभीत थे।
एक दिन अघासुर ने अपनी बहन पूतना एवं भाई बकासुर के हत्यारे कृष्ण को यहाँ अजय वन में सखाओं के संग गोचारण करते देख लिया। उसके अंदर प्रतिशोध कि ज्वाला भभक पड़ी। सब ग्वाल-बालों सहित कृष्ण को समाप्त करने के लिए अघासुर एक योजन लम्बा अजगर बन गया और यहाँ पड़ गया। उसका विशाल शरीर पर्वत के समान था। उसने अपनी जीभ बाहर फैला दी, जो लाल रंग के मार्ग कि भांति प्रतीत हो रहा था और अपना विशाल मुख खोलकर प्रतीक्षा करने लगा। उसका मुख पर्वत की कंदरा जैसी लग रही थी। कृष्ण के सखाओं ने उस गुफा को देखा तो उसके अंदर जाने का निर्णय लिया।
सब ग्वाल-बल उस गुफा में प्रवेश कर गए। श्री कृष्ण ने देखा कि यह तो अघासुर है। अपने सखाओं कि रक्षा हेतु कृष्ण भी गुफा में प्रवेश कर गए। सबको अपने भीतर देख अघासुर ने मुख बंद कर लिया। तब श्री कृष्ण अपने शरीर का विस्तार करने लगे एवं उसके मस्तक को चीर कर बाहर आ गए। अघासुर की मृत्यु हो गयी। ग्वाल-बालों को मृत देख कृष्ण ने उनको प्राण-दान किया जिससे वे जीवित हो गए। अघासुर के शरीर से एक ज्योति निकली और भगवान मुकुंद के चरणों में विलीन हो गयी।
आकाश में देवतागण श्री कृष्ण कि स्तुति करने लगे। समस्त ब्रजवासीजन श्री कृष्ण का जय-घोष करने लगे, जिसकी ध्वनि वैकुण्ठ तक पहुंची एवं इस स्थान पर विशाल गड्ढा हो गया जिसमें जल भर गया और उसे 'जय कुंड' कहने लगे एवं इस स्थान को 'जैंत' नाम प्राप्त हुआ।
कालिया नाग की लीला :
वृन्दावन की यमुना जी मे कालिया नाग का मान-मर्दन करने के उपरान्त भगवान बालकृष्ण ने नाग पत्नियों की प्रार्थना पर उसे मारा नहीं बल्कि वृन्दावन से दूर चले जाने की आज्ञा दी। कालिया ने प्रार्थना की "हे कृष्ण, सौभरि ऋषि के श्राप के कारण यहाँ गरुड़ जी नहीं आ सकते, इसी कारण मैं यहाँ निवास करता हूँ। अब यदि मैं यहाँ से बाहर जाऊंगा तो गरुड़ जी मेरा प्राणांत कर देंगे।" इसपर श्री कृष्ण ने कहा "तुम्हारे मस्तक पर मेरे चरणों का चिन्ह अंकित हो गया है, अब गरुड़ जी तुम्हें कभी कोई हानि नहीं पहुंचाएंगे। तुम यहाँ से जाओ और पीछे मुड़कर नहीं देखना। यदि तुमने पीछे मुड़कर देखा तो उसी क्षण शिला रूप हो जाओगे।" कालिया नाग कृष्ण आज्ञा से यमुना को छोड़ जाने लगा। जब वह यहाँ आया तो कौतुहल वश उसने पीछे मुड़कर देखा तो उसी क्षण शिला रूप में परिवर्तित हो गया।
ब्रजवासियों की मान्यता है कि इनकी शिला की पूंछ धरती के भीतर वृन्दावन तक जाती है। सदियों से यह संतों, भक्तों और ब्रजवासियों की आस्था का केन्द्र है।
स्थान :
जय कुंड छटीकरा से 4km उत्तर-पश्चिम में मथुरा-दिल्ली राजमार्ग पर जैंत में स्थित है।

