(दोहा)
नेम प्रेम ते परे जो, अति दुर्ल्लभ अधिकार।
रीझि देत जिहिं जुगल जु, सुमिरत सुरत बिहार॥
(पद)
जुगलवर को यह सुरत बिहार।
जो कोउ गावै सुनै सुनावै, पाबै निज अधिकार॥ [1]
नेम प्रेम तें परें परम पद, जाको अति विस्तार।
श्रीहरिप्रिया रीझि अपनावें, देत न लावें बार॥ [2]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (100)
(दोहा)
जो कोई अधिकारी इस “सुरत-सुख” का स्मरण करता है, उस पर श्री प्रिया-प्रियतम रीझ जाते हैं और उसे सुरत-सुख से उत्पन्न अति दुर्लभ उस काम-रस सुख को प्रदान करते हैं, जो रस-विधि और प्रेम-लक्षणा भक्ति से भी परे है।
(पद)
रसिक दम्पत्ति के इस सुरत विहार को जो कोई गाता है, सुनता है, अथवा सुनाता है, तो वह अति विस्तरित काम केलि उत्थित उस रस को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है। [1]
यह अद्भुत रस साधन भक्ति अथवा प्रेम लक्षणा भक्ति से भी परे है। उस अधिकारी पर स्वयं श्रीप्रिया प्रीतम रीझ जाते हैं और उसको जल्दी ही अपना लेते हैं। [2]
नेम प्रेम ते परे जो, अति दुर्ल्लभ अधिकार।
रीझि देत जिहिं जुगल जु, सुमिरत सुरत बिहार॥
(पद)
जुगलवर को यह सुरत बिहार।
जो कोउ गावै सुनै सुनावै, पाबै निज अधिकार॥ [1]
नेम प्रेम तें परें परम पद, जाको अति विस्तार।
श्रीहरिप्रिया रीझि अपनावें, देत न लावें बार॥ [2]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (100)
(दोहा)
जो कोई अधिकारी इस “सुरत-सुख” का स्मरण करता है, उस पर श्री प्रिया-प्रियतम रीझ जाते हैं और उसे सुरत-सुख से उत्पन्न अति दुर्लभ उस काम-रस सुख को प्रदान करते हैं, जो रस-विधि और प्रेम-लक्षणा भक्ति से भी परे है।
(पद)
रसिक दम्पत्ति के इस सुरत विहार को जो कोई गाता है, सुनता है, अथवा सुनाता है, तो वह अति विस्तरित काम केलि उत्थित उस रस को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है। [1]
यह अद्भुत रस साधन भक्ति अथवा प्रेम लक्षणा भक्ति से भी परे है। उस अधिकारी पर स्वयं श्रीप्रिया प्रीतम रीझ जाते हैं और उसको जल्दी ही अपना लेते हैं। [2]

