(राग विहागरौ)
कृपा तें अनहोनी हू होई।
प्रगट प्रताप कृपा को जानत, कृपा समान न कोई॥ [1]
कृपा तिहारे तन मन बचननि, सैंननि सदा बिराजै।
मो से दीन हीन पै स्वामिन, कृपा तिहारी छाजै॥ [2]
तुम कृपाल हौं अधम पोच अति, यामें नाहिंन धोखो।
जैसे जन पै कृपा सोहियत, यह बानिक है चोखो॥ [3]
तुमहूँ ते कछु कृपा तिहारी, मैं जानी अधिकाई।
कृपाधीन तुम रहत राधिके, यह रसिकन मिलि गाई॥ [4]
सो वह कृपा होइ किहिं भाँति, साधन कछु नहिं पाऊँ।
छिन-छिन छीजतु काय हाय अब, तुम बिनु काहि सुनाऊँ॥ [5]
कृपा नहीं अपनावति जौं लौं, तौं लौं हिये दुखारी।
श्रीवन पाये बिन रसिकन मैं, लाज होत जिय भारी॥ [6]
तुम सर्बग्य अग्य हौं बहु बिधि, तुम्हैं रिझाइ न जानों।
कृपा रावरी परम बावरी, ताके हाथ बिकानों॥ [7]
एहो कृपा लाड़िली जू की, मोहिं नेकु अपनइयै।
किशोरी अलि नें श्रीवन की रज, पाइ कान सुनैयै॥ [8]
- श्री किशोरी अलि जी
हे श्रीराधे! कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है। कृपा की महानता को जानकर मैं यही कहता हूँ की कृपा के समान कुछ नहीं है। [1]
केवल कृपा ही आपके तन, मन, वचन और भावों में निवास करती है। हे स्वामिनी! मुझ जैसे दीन पर भी आपकी कृपा बरसती है। [2]
आप दीन-हीन पर दया करने वाली हो, इसमें कोई संदेह नहीं है। जो भी हो, आप केवल कृपा करना ही जानती हो । इसके अतिरिक्त, आप कुछ भी नहीं जानती । [3]
हे किशोरी जी, मुझे अनुभव हो रहा है कि आपकी कृपा आपसे भी अधिक है। रसिकों ने गाया है कि आप सदैव अपनी कृपा के अधीन रहती हो । [4]
वह कृपा कैसे प्राप्त होगी, मेरे पास तो कोई साधन ही नहीं है। यह शरीर क्षण-क्षण मृत्यु को प्राप्त हो रहा है, हाय, आपके अतिरिक्त मैं यह किससे कहूँ? [5]
हे किशोरीजी! जब तक आपकी कृपा मुझे अपना नहीं लेती तब तक मेरा ह्रदय दुखी रहेगा । श्री वृन्दावन का वास तो प्राप्त कर लिया है परंतु किसी रसिक का संग नहीं प्राप्त है जिससे मेरे ह्रदय में बहुत लज्जा होती है। [6]
हे राधे, तुम सर्वज्ञ हो, मैं अज्ञानी हूँ, आपको प्रसन्न करना नहीं जानता, परन्तु आपकी कृपा तो बावरी है, वह कोई साधन नहीं देखती, इसलिए मैं आपकी कृपा के हाथों बिक गया हूँ। [7]
श्री किशोरी अलि जी कहते हैं कि "हे लाड़िली जू की कृपा, कृपया मुझे अपना लीजिये। अगर आप मुझे नहीं अपनाती, तो अपने कान से सुनें कि किशोरी अलि ने वृंदावन की रज प्राप्त की है, अत: आपको मुझे अपनाना ही होगा।” [8]
कृपा तें अनहोनी हू होई।
प्रगट प्रताप कृपा को जानत, कृपा समान न कोई॥ [1]
कृपा तिहारे तन मन बचननि, सैंननि सदा बिराजै।
मो से दीन हीन पै स्वामिन, कृपा तिहारी छाजै॥ [2]
तुम कृपाल हौं अधम पोच अति, यामें नाहिंन धोखो।
जैसे जन पै कृपा सोहियत, यह बानिक है चोखो॥ [3]
तुमहूँ ते कछु कृपा तिहारी, मैं जानी अधिकाई।
कृपाधीन तुम रहत राधिके, यह रसिकन मिलि गाई॥ [4]
सो वह कृपा होइ किहिं भाँति, साधन कछु नहिं पाऊँ।
छिन-छिन छीजतु काय हाय अब, तुम बिनु काहि सुनाऊँ॥ [5]
कृपा नहीं अपनावति जौं लौं, तौं लौं हिये दुखारी।
श्रीवन पाये बिन रसिकन मैं, लाज होत जिय भारी॥ [6]
तुम सर्बग्य अग्य हौं बहु बिधि, तुम्हैं रिझाइ न जानों।
कृपा रावरी परम बावरी, ताके हाथ बिकानों॥ [7]
एहो कृपा लाड़िली जू की, मोहिं नेकु अपनइयै।
किशोरी अलि नें श्रीवन की रज, पाइ कान सुनैयै॥ [8]
- श्री किशोरी अलि जी
हे श्रीराधे! कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है। कृपा की महानता को जानकर मैं यही कहता हूँ की कृपा के समान कुछ नहीं है। [1]
केवल कृपा ही आपके तन, मन, वचन और भावों में निवास करती है। हे स्वामिनी! मुझ जैसे दीन पर भी आपकी कृपा बरसती है। [2]
आप दीन-हीन पर दया करने वाली हो, इसमें कोई संदेह नहीं है। जो भी हो, आप केवल कृपा करना ही जानती हो । इसके अतिरिक्त, आप कुछ भी नहीं जानती । [3]
हे किशोरी जी, मुझे अनुभव हो रहा है कि आपकी कृपा आपसे भी अधिक है। रसिकों ने गाया है कि आप सदैव अपनी कृपा के अधीन रहती हो । [4]
वह कृपा कैसे प्राप्त होगी, मेरे पास तो कोई साधन ही नहीं है। यह शरीर क्षण-क्षण मृत्यु को प्राप्त हो रहा है, हाय, आपके अतिरिक्त मैं यह किससे कहूँ? [5]
हे किशोरीजी! जब तक आपकी कृपा मुझे अपना नहीं लेती तब तक मेरा ह्रदय दुखी रहेगा । श्री वृन्दावन का वास तो प्राप्त कर लिया है परंतु किसी रसिक का संग नहीं प्राप्त है जिससे मेरे ह्रदय में बहुत लज्जा होती है। [6]
हे राधे, तुम सर्वज्ञ हो, मैं अज्ञानी हूँ, आपको प्रसन्न करना नहीं जानता, परन्तु आपकी कृपा तो बावरी है, वह कोई साधन नहीं देखती, इसलिए मैं आपकी कृपा के हाथों बिक गया हूँ। [7]
श्री किशोरी अलि जी कहते हैं कि "हे लाड़िली जू की कृपा, कृपया मुझे अपना लीजिये। अगर आप मुझे नहीं अपनाती, तो अपने कान से सुनें कि किशोरी अलि ने वृंदावन की रज प्राप्त की है, अत: आपको मुझे अपनाना ही होगा।” [8]

