कान्हर कारो नंद दुलारो, मो नयनन को तारो री।
प्राण पियारो जग उजियारो, मोहन मीत हमारो री॥ [1]
दृग में राजत हिय में छाजत, एक छिनो नहिं न्यारो री।
मुरली टेर सुनावत निसदिन, रूप अनूपम वारो री॥ [2]
चरन कमल मकरन्द लुब्ध है, मन मधुकर मतवारो री।
'रसरँग' केलि छबीले प्रभु सँग, हित सों सदा निहारो री॥ [3]
- श्री रसरंगमणि जी
काले वर्ण वाले कन्हैया, नन्द के दुलारे, मेरी आँखों के तारे हैं। मेरे प्राण-प्यारे मनमोहन, जगत को प्रकाश देने वाले हैं एवं मेरे मित्र हैं। [1]
वे नित्य ही मेरी आँखों में विराजते हैं, मेरे ह्रदय में छाये रहते हैं, एक क्षण भी दूर नहीं होते। वे निशिदिन मुझे मुरली की धुन सुनाते हैं, उनका रूप अति अनुपम है। [2]
मेरा मन मतवाले भौंरे की भांति उनके श्री चरण कमलों के मकरंद पर लुब्ध रहता है। श्री रसरंगमणि जी कहते हैं कि छबीले प्रभु श्री कृष्ण के संग मैं नित्य ही उनकी प्रेम भरी केलि लीला को निहारता रहता हूँ। [3]
प्राण पियारो जग उजियारो, मोहन मीत हमारो री॥ [1]
दृग में राजत हिय में छाजत, एक छिनो नहिं न्यारो री।
मुरली टेर सुनावत निसदिन, रूप अनूपम वारो री॥ [2]
चरन कमल मकरन्द लुब्ध है, मन मधुकर मतवारो री।
'रसरँग' केलि छबीले प्रभु सँग, हित सों सदा निहारो री॥ [3]
- श्री रसरंगमणि जी
काले वर्ण वाले कन्हैया, नन्द के दुलारे, मेरी आँखों के तारे हैं। मेरे प्राण-प्यारे मनमोहन, जगत को प्रकाश देने वाले हैं एवं मेरे मित्र हैं। [1]
वे नित्य ही मेरी आँखों में विराजते हैं, मेरे ह्रदय में छाये रहते हैं, एक क्षण भी दूर नहीं होते। वे निशिदिन मुझे मुरली की धुन सुनाते हैं, उनका रूप अति अनुपम है। [2]
मेरा मन मतवाले भौंरे की भांति उनके श्री चरण कमलों के मकरंद पर लुब्ध रहता है। श्री रसरंगमणि जी कहते हैं कि छबीले प्रभु श्री कृष्ण के संग मैं नित्य ही उनकी प्रेम भरी केलि लीला को निहारता रहता हूँ। [3]

