प्रेम हरि को रूप है, त्यौं हरि प्रेम स्वरूप।
एक होई द्वै यों लसैं, ज्यौं सूरज अरु धूप॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (24)
प्रेम ही श्री हरि का रूप है और श्री हरि ही प्रेम हैं । एक होकर भी वे दो दिखते हैं जैसे सूरज और उसकी धूप ।
एक होई द्वै यों लसैं, ज्यौं सूरज अरु धूप॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (24)
प्रेम ही श्री हरि का रूप है और श्री हरि ही प्रेम हैं । एक होकर भी वे दो दिखते हैं जैसे सूरज और उसकी धूप ।

