चिंताकापि न कार्या निवेदितात्मभिः कदापीति।
भगवानपि पुष्टिस्थो न करिष्यति लौकिकीं च गतिम्॥ [1]
जिसने स्वयं को श्री कृष्ण चरणों में आत्मनिवेदन कर दिया है उसे कदापि चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि परम कृपालु भगवान अंगीकृत जीवों को लौकिक गति प्रदान नहीं करेंगे। [1]
निवेदनं तु स्मर्तव्यं सर्वथा तादृशैर्जनैः।
सर्वेश्वरश्च सर्वात्मा निजेच्छातः करिष्यति॥ [2]
भगवान के प्रति अपने समर्पण को सदा स्मरण रखना चाहिए एवं भगवद् प्राप्त महापुरुषों का ही सदा संग करते रहना चाहिए । सर्वेश्वर भगवान जो सबकी आत्मा हैं अपनी इच्छा अनुसार जो तुम्हारे लिए उचित होगा वही करेंगें । [2]
सर्वेषां प्रभुसम्बम्धो न प्रत्येकमिति स्थितिः।
अतोऽन्य विनियोगेऽपि चिंता का स्वस्य सोऽपिचेत्॥ [3]
सब कुछ भगवान कृष्ण से ही सम्बंधित है और उनसे कुछ भी विलग नहीं है। इसलिए, यदि आप ऐसी गतिविधियों (या कार्यों) में संलग्न हैं जो आपको लगता है कि उनसे संबंधित नहीं हैं, तो चिंता करने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि वे वास्तव में उन्हीं से सम्बंधित हैं। [3]
अज्ञानादथवा ज्ञानात् कृतमात्मनिवेदनम्।
यैः कृष्णसात्कृत प्राणैस्तेषां का परिदेवना॥ [4]
अज्ञान से अथवा ज्ञान से जिन्होनें आत्मनिवेदन किया है, उन्हें चिंता करना उचित नहीं है । फिर जिन्होंने श्री कृष्ण को प्राण समर्पण कर दिया है, उन्हें किस बात का शोक है ? [4]
तथा निवेदने चिंता त्याज्या श्रीपुरुषोत्तमे।
विनियोगेऽपि सा त्याज्या समर्थो हि हरिः स्वतः॥ [5]
पूर्णतम पुरुषोत्तम श्री कृष्ण को निवेदन कर देने पर चिंता को त्याग देना चाहिए । सांसारिक कार्यों एवं कर्तव्यों में भी चिंता का परित्याग करना चाहिए क्योंकि श्री हरि सब प्रकार से समर्थ हैं । [5]
लोके स्वास्थ्यं तथा वेदे हरिस्तु न करिष्यति।
पुष्टिमार्गस्थितोयस्मात्साक्षिणोभवताऽखिलाः॥ [6]
पुष्टि मार्ग (अनुग्रह मार्ग) में स्थित भक्त को भगवान लोक और वेद के फेर में नहीं डालेंगें । इस विषय में समस्त भक्त साक्षी रूप हैं । [6]
सेवाकृतिर्गुरोराज्ञा बाधनं वा हरीच्छया।
अतः सेवापरं चित्तं विधायस्थीयतां सुखम्॥ [7]
गुरु की आज्ञा के अनुसार ही सेवा करनी चाहिए। परंतु यदि किसी कारणवश गुरु की आज्ञा के अनुसार सेवा न हो पाए तो उसे हरि की इच्छा ही समझना चाहिए एवं उन श्री हरि की इच्छा अनुसार ही चलना चाहिए एवं मन से सेवा करनी चाहिए और सुख में रहना चाहिए। [7]
चित्तोद्वेगं विधायापि हरिर्यद्यत्करिष्यति।
तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिंतां द्रुतं त्यजेत॥ [8]
यदि किसी कारण आपके चित्त में द्वेग उत्पन्न हो रहा है तो ऐसा मान कर कि श्रीहरि जो भी करेंगे वह अच्छा ही करेंगे, यह उनकी लीला मात्र है, चिंता को शीघ्र त्याग दें। [8]
तस्मात्सर्वात्मना नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम।
वदद्भिरेवं सततं स्थेयमित्येव मे मतिः॥ [9]
इसलिए ऐसा महसूस करना चाहिए कि श्री कृष्ण हर जगह व्याप्त हैं एवं वे सभी की आत्मा हैं और निरंतर चिंतन करना चाहिए कि "मैं श्री कृष्ण की शरण में हूँ"। यह मेरा दृढ़ मत है। [9]
- महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, नवरत्नम्
भगवानपि पुष्टिस्थो न करिष्यति लौकिकीं च गतिम्॥ [1]
जिसने स्वयं को श्री कृष्ण चरणों में आत्मनिवेदन कर दिया है उसे कदापि चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि परम कृपालु भगवान अंगीकृत जीवों को लौकिक गति प्रदान नहीं करेंगे। [1]
निवेदनं तु स्मर्तव्यं सर्वथा तादृशैर्जनैः।
सर्वेश्वरश्च सर्वात्मा निजेच्छातः करिष्यति॥ [2]
भगवान के प्रति अपने समर्पण को सदा स्मरण रखना चाहिए एवं भगवद् प्राप्त महापुरुषों का ही सदा संग करते रहना चाहिए । सर्वेश्वर भगवान जो सबकी आत्मा हैं अपनी इच्छा अनुसार जो तुम्हारे लिए उचित होगा वही करेंगें । [2]
सर्वेषां प्रभुसम्बम्धो न प्रत्येकमिति स्थितिः।
अतोऽन्य विनियोगेऽपि चिंता का स्वस्य सोऽपिचेत्॥ [3]
सब कुछ भगवान कृष्ण से ही सम्बंधित है और उनसे कुछ भी विलग नहीं है। इसलिए, यदि आप ऐसी गतिविधियों (या कार्यों) में संलग्न हैं जो आपको लगता है कि उनसे संबंधित नहीं हैं, तो चिंता करने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि वे वास्तव में उन्हीं से सम्बंधित हैं। [3]
अज्ञानादथवा ज्ञानात् कृतमात्मनिवेदनम्।
यैः कृष्णसात्कृत प्राणैस्तेषां का परिदेवना॥ [4]
अज्ञान से अथवा ज्ञान से जिन्होनें आत्मनिवेदन किया है, उन्हें चिंता करना उचित नहीं है । फिर जिन्होंने श्री कृष्ण को प्राण समर्पण कर दिया है, उन्हें किस बात का शोक है ? [4]
तथा निवेदने चिंता त्याज्या श्रीपुरुषोत्तमे।
विनियोगेऽपि सा त्याज्या समर्थो हि हरिः स्वतः॥ [5]
पूर्णतम पुरुषोत्तम श्री कृष्ण को निवेदन कर देने पर चिंता को त्याग देना चाहिए । सांसारिक कार्यों एवं कर्तव्यों में भी चिंता का परित्याग करना चाहिए क्योंकि श्री हरि सब प्रकार से समर्थ हैं । [5]
लोके स्वास्थ्यं तथा वेदे हरिस्तु न करिष्यति।
पुष्टिमार्गस्थितोयस्मात्साक्षिणोभवताऽखिलाः॥ [6]
पुष्टि मार्ग (अनुग्रह मार्ग) में स्थित भक्त को भगवान लोक और वेद के फेर में नहीं डालेंगें । इस विषय में समस्त भक्त साक्षी रूप हैं । [6]
सेवाकृतिर्गुरोराज्ञा बाधनं वा हरीच्छया।
अतः सेवापरं चित्तं विधायस्थीयतां सुखम्॥ [7]
गुरु की आज्ञा के अनुसार ही सेवा करनी चाहिए। परंतु यदि किसी कारणवश गुरु की आज्ञा के अनुसार सेवा न हो पाए तो उसे हरि की इच्छा ही समझना चाहिए एवं उन श्री हरि की इच्छा अनुसार ही चलना चाहिए एवं मन से सेवा करनी चाहिए और सुख में रहना चाहिए। [7]
चित्तोद्वेगं विधायापि हरिर्यद्यत्करिष्यति।
तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिंतां द्रुतं त्यजेत॥ [8]
यदि किसी कारण आपके चित्त में द्वेग उत्पन्न हो रहा है तो ऐसा मान कर कि श्रीहरि जो भी करेंगे वह अच्छा ही करेंगे, यह उनकी लीला मात्र है, चिंता को शीघ्र त्याग दें। [8]
तस्मात्सर्वात्मना नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम।
वदद्भिरेवं सततं स्थेयमित्येव मे मतिः॥ [9]
इसलिए ऐसा महसूस करना चाहिए कि श्री कृष्ण हर जगह व्याप्त हैं एवं वे सभी की आत्मा हैं और निरंतर चिंतन करना चाहिए कि "मैं श्री कृष्ण की शरण में हूँ"। यह मेरा दृढ़ मत है। [9]
- महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, नवरत्नम्

