जाग्रत स्वप्न सुषुप्तिही - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

जाग्रत स्वप्न सुषुप्तिही - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

जाग्रत स्वप्न सुषुप्तिही हरि राधा पद को ध्यान।
रहौं नर्क वैकुंठ के मोहि नहीं गति आन॥

- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

जागृत, स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्था में भी श्रीराधा कृष्ण के चरण कमलों की छटा ही मेरे मन में स्फुरित होती रहे । बैकुण्ठ अथवा नरक में भी उनके अतिरिक्त मेरे लिये कोई अन्य गति न हो ।