टेड़ी लसें भृकुटीन पै पाग - ब्रज के सवैया

टेड़ी लसें भृकुटीन पै पाग - ब्रज के सवैया

टेड़ी लसें भृकुटीन पै पाग, अस नैनि दिपे मानो उभो प्रभाकर। [1]
रावरो दास पुकार कहै, मैंने नाम सुन्यो तेरो दीनदयाकर॥ [2]
माधुरी रूप लख्यो जब ते, बल्देव भयो नित ही उठि चाकर। [3]
नाहिन तिनहु लोकन में कोऊ, कुञ्जबिहारी सो दूसरो ठाकुर॥ [4]

- ब्रज के सवैया

टेढ़ी-टेढ़ी भौंहें लचक रही हैं, सिर पर पगड़ी सुशोभित है, और नेत्र ऐसे चमक रहे हैं मानो दो सूरज खड़े हों। [1]

तुम्हारा दास पुकार कर कहता है: हे दीनदयाल! मैंने तुम्हारा नाम सुना है। [2]

जिस क्षण से मैंने आपकी रूप माधुरी को निहारा है उसी क्षण से ही मैं आपका नित्य दास हो चुका हूँ। [3]

तीनों लोकों में कुञ्जबिहारी श्रीकृष्ण के समान दूसरा कोई ठाकुर नहीं है। [4]