भेष फ़क़ीरी जे करै मन नहिं आवै हाथ - श्री मलूक दास

भेष फ़क़ीरी जे करै मन नहिं आवै हाथ - श्री मलूक दास

भेष फ़क़ीरी जे करै, मन नहिं आवै हाथ ।
दिल फ़क़ीर जे हो रहे, साहेब तिनके साथ ॥

- श्री मालुक दास

जिन्होंने भेष तो साधु संतों वाला रख लिया है, परंतु मन संसार में ही आसक्त है, तो उससे क्या लाभ होगा? परंतु यदि मन फ़क़ीरी में रमा हुआ है, अर्थात् भगवान के प्रेम में उन्मत्त है, तो उसने श्री हरि को अधीन कर लिया है।