(राग काफी, धीमा ताल)
या साँवरे सों मैं प्रीति लगाई।
कुल कलंक ते नाहिं डरूँगी, अब तौ करूं अपने मन भाई॥ [1]
बीच बजार पुकार कहूँ मैं, चाहे करौ तुम कोटि बुराई।
लाज म्रजाद मिली औरन कूं, मृदु मुसिकान मेरे बट आई॥ [2]
बिन देखे मनमोहन को मुख, मोहि लगत त्रिभुवन दुखदाई।
नारायण तिनकूँ सब फीको, जिन चाखी यह रूप मिठाई॥ [3]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सखी अनुराग लीला (3)
हे सखी, मेरे मन ने सांवरे सलोने कृष्ण चन्द्र से प्रीति जोड़ ली है। अब मैं कुल की मर्यादा का पालन न करने के कलंक से नहीं डरूंगी, जो अब मेरा मन कहेगा, वही करूँगी। [1]
चाहे तुम मेरी लाख बुराई करो, अब मैं बीच बाजार खड़ी होकर पुकार कर यह कहती हूँ। लज्जा एवं मर्यादा औरों के पास ही रहने दो, मेरे चिंतन में (भाग्य में) तो सदा मनमोहन की मधुर मुस्कान को रहने दो । [2]
मनमोहन श्री कृष्ण के मुख-कमल को देखे बिना तीनों लोक मुझे दुःखदायी प्रतीत होते हैं। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जिन्होंने श्री कृष्ण की मिठाई रूपी रूप माधुरी का आस्वादन कर लिया है, उन्हें अन्य सब कुछ फीका ही लगता है। [3]
या साँवरे सों मैं प्रीति लगाई।
कुल कलंक ते नाहिं डरूँगी, अब तौ करूं अपने मन भाई॥ [1]
बीच बजार पुकार कहूँ मैं, चाहे करौ तुम कोटि बुराई।
लाज म्रजाद मिली औरन कूं, मृदु मुसिकान मेरे बट आई॥ [2]
बिन देखे मनमोहन को मुख, मोहि लगत त्रिभुवन दुखदाई।
नारायण तिनकूँ सब फीको, जिन चाखी यह रूप मिठाई॥ [3]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सखी अनुराग लीला (3)
हे सखी, मेरे मन ने सांवरे सलोने कृष्ण चन्द्र से प्रीति जोड़ ली है। अब मैं कुल की मर्यादा का पालन न करने के कलंक से नहीं डरूंगी, जो अब मेरा मन कहेगा, वही करूँगी। [1]
चाहे तुम मेरी लाख बुराई करो, अब मैं बीच बाजार खड़ी होकर पुकार कर यह कहती हूँ। लज्जा एवं मर्यादा औरों के पास ही रहने दो, मेरे चिंतन में (भाग्य में) तो सदा मनमोहन की मधुर मुस्कान को रहने दो । [2]
मनमोहन श्री कृष्ण के मुख-कमल को देखे बिना तीनों लोक मुझे दुःखदायी प्रतीत होते हैं। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जिन्होंने श्री कृष्ण की मिठाई रूपी रूप माधुरी का आस्वादन कर लिया है, उन्हें अन्य सब कुछ फीका ही लगता है। [3]

