राजत आजु कुँवरि अति नीकी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (122)

राजत आजु कुँवरि अति नीकी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (122)

राजत आजु कुँवरि अति नीकी।
नौ तन तरुनि किशोरी नागरी, रसिकनि जीवनि जी की॥ [1]
सुंदर चन्द वदन मुसिकनि मैं, सींचति बेलि अमी की।
अलबेली अलि निरखि माधुरी, हिलग बढ़ी अति ही की॥ [2]

- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (122)

कुँवरि श्री राधा आज अति सुन्दर सुशोभित हैं। वे नवीन अवस्था की तरुण किशोरी हैं जो परम चतुर हैं एवं रसिकों के जीवन की आधार हैं। [1]

श्री किशोरी जी का वदन कमल चंद्र की भांति अति सुन्दर है एवं अपनी मधुर मुस्कान से वे अमृत की बेली का सिंचन करती हैं। श्री अलबेली अलि जी कहते हैं कि श्री राधा की रूप-माधुरी को निहार कर मेरे ह्रदय में प्रेम अति ही बढ़ने लगा है। [2]