नारायण या प्रेम को, नद उमड़त जो ठौर ।
पलमें लाज म्रजादके, तट काटत है दौर ॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (146)
जिस हृदय में प्रेम रूपी नदी उमड़ पड़ती है, वहाँ एक ही पल में लज्जा एवं मर्यादा रूपी सीमाओं को तोड़ कर आगे निकल जाती है।
पलमें लाज म्रजादके, तट काटत है दौर ॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (146)
जिस हृदय में प्रेम रूपी नदी उमड़ पड़ती है, वहाँ एक ही पल में लज्जा एवं मर्यादा रूपी सीमाओं को तोड़ कर आगे निकल जाती है।

