सर्व साधन हीनञ्च दीनन्त्वतिकुबुद्धिभि:।
समाकीर्णं त्वमद्रेन्द्र नैवोपेक्षितुमर्हसि॥
- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (95)
हे शैल-राज श्री गोवर्धन, देखो, यद्यपि मैं सकल साधनहीन, अति दीन और कुबुद्धि हूँ, तथापि आप मेरी उपेक्षा करने योग्य नहीं हैं अर्थात्, शरणागत को आप आश्रय प्रदान कीजिए।
समाकीर्णं त्वमद्रेन्द्र नैवोपेक्षितुमर्हसि॥
- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (95)
हे शैल-राज श्री गोवर्धन, देखो, यद्यपि मैं सकल साधनहीन, अति दीन और कुबुद्धि हूँ, तथापि आप मेरी उपेक्षा करने योग्य नहीं हैं अर्थात्, शरणागत को आप आश्रय प्रदान कीजिए।

