(राग विहागरौ)
खंजन नैन सुरंग रसमाते।
अतिसय चारु विमल, चंचल ये, पल-पिंजरा न समाते॥ [1]
बसे कहूँ सोइ, बात सखी, कहि रहैं इहाँ किहि नाते।
सोइ संज्ञा देखति औरासी, विकल उदास कलातैं॥ [2]
चालि चालि जात निकट स्रवननि के, सकि ताटंक फंदाते।
सूरदास अंजन-गुन अटके, नतरू कबै उड़िजाते॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
श्री कृष्ण के कमल-नयन खंजन पक्षी की भांति हैं जो श्री राधा की रूप-माधुरी के रस में मत्त है, जो अतिशय सुंदर, निर्मल एवं चंचल हैं, एक क्षण के लिए भी पलकों के पिंजरे में समाते नहीं। [1]
हे सखी, ये नेत्र कहीं और ही बसे हैं, तो यहाँ किस नाते से रहें? चंचल बने ये नेत्र सदैव उसी संज्ञा (श्री राधा की रूप-माधुरी) को अनन्य रूप से देखते रहते हैं, तथा विकल बने रहते हैं एवं और-और कलाओं से उदासीन रहते हैं। [2]
श्री कृष्ण के नेत्र तिरछे होकर कानों तक आ पहुँचते हैं, मानो कुंडलों में फंस जाएंगे। श्री सूरदास जी कहते हैं कि श्री कृष्ण के नेत्र काजल की रेखा में अटके हुए हैं, नहीं तो कब के उड़ जाते। [3]
खंजन नैन सुरंग रसमाते।
अतिसय चारु विमल, चंचल ये, पल-पिंजरा न समाते॥ [1]
बसे कहूँ सोइ, बात सखी, कहि रहैं इहाँ किहि नाते।
सोइ संज्ञा देखति औरासी, विकल उदास कलातैं॥ [2]
चालि चालि जात निकट स्रवननि के, सकि ताटंक फंदाते।
सूरदास अंजन-गुन अटके, नतरू कबै उड़िजाते॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
श्री कृष्ण के कमल-नयन खंजन पक्षी की भांति हैं जो श्री राधा की रूप-माधुरी के रस में मत्त है, जो अतिशय सुंदर, निर्मल एवं चंचल हैं, एक क्षण के लिए भी पलकों के पिंजरे में समाते नहीं। [1]
हे सखी, ये नेत्र कहीं और ही बसे हैं, तो यहाँ किस नाते से रहें? चंचल बने ये नेत्र सदैव उसी संज्ञा (श्री राधा की रूप-माधुरी) को अनन्य रूप से देखते रहते हैं, तथा विकल बने रहते हैं एवं और-और कलाओं से उदासीन रहते हैं। [2]
श्री कृष्ण के नेत्र तिरछे होकर कानों तक आ पहुँचते हैं, मानो कुंडलों में फंस जाएंगे। श्री सूरदास जी कहते हैं कि श्री कृष्ण के नेत्र काजल की रेखा में अटके हुए हैं, नहीं तो कब के उड़ जाते। [3]

