(राग जैजैवंती - ताल तिताला)
मैं पाऊ कृपाकरि मोहिनी, श्रीकुञ्ज भवनकी सोहिनी।
मन मानिक मुक्ता लर टूटैं, बिखरि परै सो खोजिनी॥ [1]
होत प्रभात सुहात न अब कछु, करूँ टहल हिय सोधिनी।
'जुगलप्रिया' बड़ भाग मनाऊँ, चरन चिन्ह रज लोभिनी॥ [2]
- श्री जुगलप्रिया जी
मन को मोहित करने वाले, श्री श्यामाश्याम के कुञ्ज भवन की सोहनी सेवा को कृपापूर्वक मैं कब प्राप्त करुँगी ? जहाँ श्री श्यामाश्याम के अंगों के आभूषणों की मणियाँ, माणिक्य, मुक्ता, आदि रत्न जब टूट कर बिखरेंगे तो मैं उन्हें खोजूँगी। [1]
अब मुझे प्रभात में अन्य कुछ नहीं सुहाता, मेरी यही अभिलाषा है कि अपने ह्रदय का शोधन कर मैं महल की टहल (सेवा) में उपस्थित हो जाऊँ । श्री जुगलप्रिया जी कहते हैं कि श्री श्यामाश्याम के कुञ्ज भवन की रज में, उनके चरण चिन्हों के दर्शन कर, कब मैं अपने भाग्य की सराहना करुँगी ? [2]
मैं पाऊ कृपाकरि मोहिनी, श्रीकुञ्ज भवनकी सोहिनी।
मन मानिक मुक्ता लर टूटैं, बिखरि परै सो खोजिनी॥ [1]
होत प्रभात सुहात न अब कछु, करूँ टहल हिय सोधिनी।
'जुगलप्रिया' बड़ भाग मनाऊँ, चरन चिन्ह रज लोभिनी॥ [2]
- श्री जुगलप्रिया जी
मन को मोहित करने वाले, श्री श्यामाश्याम के कुञ्ज भवन की सोहनी सेवा को कृपापूर्वक मैं कब प्राप्त करुँगी ? जहाँ श्री श्यामाश्याम के अंगों के आभूषणों की मणियाँ, माणिक्य, मुक्ता, आदि रत्न जब टूट कर बिखरेंगे तो मैं उन्हें खोजूँगी। [1]
अब मुझे प्रभात में अन्य कुछ नहीं सुहाता, मेरी यही अभिलाषा है कि अपने ह्रदय का शोधन कर मैं महल की टहल (सेवा) में उपस्थित हो जाऊँ । श्री जुगलप्रिया जी कहते हैं कि श्री श्यामाश्याम के कुञ्ज भवन की रज में, उनके चरण चिन्हों के दर्शन कर, कब मैं अपने भाग्य की सराहना करुँगी ? [2]

