ललिता हरिदास हिये में बस्यौ - ब्रज के सवैया

ललिता हरिदास हिये में बस्यौ - ब्रज के सवैया

ललिता हरिदास हिये में बस्यौ, अब और सखी कछु ना चहिये। [1]
दिन-रैन सदा संग लाग्यो रहै, बिन चैन न आवै कहा कहिये॥ [2]
श्याम रिझावत स्यामाँहिं प्रेम सों, केलि करें रस वेलहु लहिये। [3]
हों तो गुलाम ललाम भई छबि, पिय प्यारे निहारे कहाँ जहिये॥ [4]

- ब्रज के सवैया

हे सखी, ललिता सखी श्री हरिदास मेरे मन-मंदिर में विराजते हैं, अब और कोई अभिलाषा नहीं। [1]

दिन-रात उनकी ही के संग में रहती हूँ; उनके बिना क्षण भर भी चैन नहीं। [2]

श्रीकृष्ण श्रीराधा को प्रेम से रिझा रहे हैं, और उनके इस केलि-लीला रस का अमृत पान मैं कर रही हूँ। [3]

मैं तो सहज ही इस युगल जोड़ी की मधुर छवि की गुलाम हो गई हूँ, जिसके दर्शन के बिना मेरी कोई गति नहीं है। [4]