अहो कृपामयी लाड़ली, प्यारी परम उदार।
वन विनोद सुख कारिनी, रसिकन प्राण अधार॥
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (5)
हे परम करुणामयी लाड़ली, परम उदार प्यारी जू आपकी जय हो! वन में मंजुल रस बरसाने वाली, रसिकों की प्राणाधार, श्री राधा महारानी की जय हो ।
वन विनोद सुख कारिनी, रसिकन प्राण अधार॥
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (5)
हे परम करुणामयी लाड़ली, परम उदार प्यारी जू आपकी जय हो! वन में मंजुल रस बरसाने वाली, रसिकों की प्राणाधार, श्री राधा महारानी की जय हो ।

![अहो कृपामयी लाड़ली - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (5)](https://images.brajrasik.org/66138e5eb0bc18000864f72c-m.jpeg)