(राग धनाश्री)
मोहनलाल के रसमाती।
वधू गुपत गोवति कत मोसौं, प्रथम नेह सकुचाती॥ [1]
देखि सँभार पीत पट ऊपर, कहाँ चूनरी राती।
टूटी लर लटकति मोतिनु की, नख-विधु अंकित छाती॥ [2]
अधर-बिम्ब खंडित, मषि मंडित गंड, चलत अरूझाती।
अरुन नैन घूमत आलस जुत, कुसुम गलित लट पाती॥ [3]
आजु रहसि मोहन सब लूटी, विविध आपनी थाती।
(जैश्री) हित हरिवंश वचन सुनि भामिनि, भवन चली मुसिकाती॥ [4]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (20)
हे राधे ! तू मोहन लाल के रस में उन्मत्त है। हे नव वधू ! उस एकान्त मिलन की गोप्य बात को क्यों मुझसे छिपा रही है? इसीलिये न कि प्रथम स्नेह के कारण संकोच है ! [1]
अरी ! जरा सम्हाल कर देख तेरे शरीर पर तो पीताम्बर है और रँगदार चूनरी जाने कहाँ गयी ? हृदय पर मोतियों की टूटी लड़ लटक रही है एवं वक्षस्थल नख चन्द्रों से अङ्कित है। [2]
तेरे बिम्बाफल जैसे अधर खण्डित है-क्षत विक्षत हैं, कपोल भी कज्जल से रँगे हुए हैं और तू चलती भी कुछ उलझती सी लटपताती सी। सखि ! तेरे अरुण नयन आलस्य से भरे होने के कारण घूम-घूम-झँप झँप जाते हैं, फूलों की मालाएँ मसल गयी हैं और केश लटें भी बिखर चुकी हैं। [3]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु (सखी रूप से) कहते हैं- राधे ! आज मोहन ने एकान्त में अपनी सारी विविध प्रकार की धरोहरें लूट लीं। इस प्रकार श्रीहरिवंश के वचनों को सुन कर भामिनि (श्रीराधा) मुसकाती निकुञ्ज भवन की ओर चली गयीं। [4]
मोहनलाल के रसमाती।
वधू गुपत गोवति कत मोसौं, प्रथम नेह सकुचाती॥ [1]
देखि सँभार पीत पट ऊपर, कहाँ चूनरी राती।
टूटी लर लटकति मोतिनु की, नख-विधु अंकित छाती॥ [2]
अधर-बिम्ब खंडित, मषि मंडित गंड, चलत अरूझाती।
अरुन नैन घूमत आलस जुत, कुसुम गलित लट पाती॥ [3]
आजु रहसि मोहन सब लूटी, विविध आपनी थाती।
(जैश्री) हित हरिवंश वचन सुनि भामिनि, भवन चली मुसिकाती॥ [4]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (20)
हे राधे ! तू मोहन लाल के रस में उन्मत्त है। हे नव वधू ! उस एकान्त मिलन की गोप्य बात को क्यों मुझसे छिपा रही है? इसीलिये न कि प्रथम स्नेह के कारण संकोच है ! [1]
अरी ! जरा सम्हाल कर देख तेरे शरीर पर तो पीताम्बर है और रँगदार चूनरी जाने कहाँ गयी ? हृदय पर मोतियों की टूटी लड़ लटक रही है एवं वक्षस्थल नख चन्द्रों से अङ्कित है। [2]
तेरे बिम्बाफल जैसे अधर खण्डित है-क्षत विक्षत हैं, कपोल भी कज्जल से रँगे हुए हैं और तू चलती भी कुछ उलझती सी लटपताती सी। सखि ! तेरे अरुण नयन आलस्य से भरे होने के कारण घूम-घूम-झँप झँप जाते हैं, फूलों की मालाएँ मसल गयी हैं और केश लटें भी बिखर चुकी हैं। [3]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु (सखी रूप से) कहते हैं- राधे ! आज मोहन ने एकान्त में अपनी सारी विविध प्रकार की धरोहरें लूट लीं। इस प्रकार श्रीहरिवंश के वचनों को सुन कर भामिनि (श्रीराधा) मुसकाती निकुञ्ज भवन की ओर चली गयीं। [4]

