व्यास विदित चतुराइयनि, उपदेसै संसार।
करनी नाव चढ़े बिना, क्यौं करि पावै पार॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (53)
कुछ कपटी ऐसे होते हैं जो स्वयं तो सदा संसार में आसक्त रहते हैं परंतु दूसरों को संसार से अनासक्त कराने का उपदेश देते रहते हैं । जो स्वयं कभी नाव पर चढ़ा ही न हो वो स्वयं को (अथवा दूसरे को) समुद्र से पार कैसे करा सकता है ?
करनी नाव चढ़े बिना, क्यौं करि पावै पार॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (53)
कुछ कपटी ऐसे होते हैं जो स्वयं तो सदा संसार में आसक्त रहते हैं परंतु दूसरों को संसार से अनासक्त कराने का उपदेश देते रहते हैं । जो स्वयं कभी नाव पर चढ़ा ही न हो वो स्वयं को (अथवा दूसरे को) समुद्र से पार कैसे करा सकता है ?

