हित की बात लाड़िली जानैं।
नेह निबाहत बिनु नेहिनु सों, मधुर बात हिय सानैं॥ [1]
दोस न लेत दोस पूरन को, प्रीति आगरी ठानैं।
जय श्री बंशी अलि स्वभाव याको यह, रंचक चाह बिकानैं॥ [2]
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (3)
केवल श्री लाडलीजी (श्री राधा) ही हित (प्रेम) की बातों को जानती हैं । जो प्रेम विहीन हैं उनसे भी वे प्रेम को निभाना जानती हैं एवं सदा अपने ह्रदय में करुणा को संजोये रखती हैं । [1]
जो दोषों से परिपूर्ण हैं उनका भी वे दोष देखना नहीं जानती, एवं उन पर भी कृपा बरसाने को सदा आतुर बनी रहती हैं । श्री वंशी अली जी कहते हैं कि श्री राधा रानी के इसी स्वभाव पर ही वे उनके हाथों सदा बिके हुए रहते हैं । [2]
नेह निबाहत बिनु नेहिनु सों, मधुर बात हिय सानैं॥ [1]
दोस न लेत दोस पूरन को, प्रीति आगरी ठानैं।
जय श्री बंशी अलि स्वभाव याको यह, रंचक चाह बिकानैं॥ [2]
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (3)
केवल श्री लाडलीजी (श्री राधा) ही हित (प्रेम) की बातों को जानती हैं । जो प्रेम विहीन हैं उनसे भी वे प्रेम को निभाना जानती हैं एवं सदा अपने ह्रदय में करुणा को संजोये रखती हैं । [1]
जो दोषों से परिपूर्ण हैं उनका भी वे दोष देखना नहीं जानती, एवं उन पर भी कृपा बरसाने को सदा आतुर बनी रहती हैं । श्री वंशी अली जी कहते हैं कि श्री राधा रानी के इसी स्वभाव पर ही वे उनके हाथों सदा बिके हुए रहते हैं । [2]

