रसिक रसिक सब कोऊ कहै - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (13)

रसिक रसिक सब कोऊ कहै - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (13)

रसिक रसिक सब कोऊ कहै, कठिन रसिकता रीत।
बाहिर दर्शे दीनता, अंतर में विपरीत॥

- श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (13)

“रसिक रसिक” तो स्वयं को हर कोई कहलाना चाहता है परंतु रसिकता आनी अत्यंत कठिन होती है । साधक बाहर से तो दीनता का स्वाँग कर लेता है परंतु अंतर मन में दीनता की कुछ और ही स्थिति होती है ।