(राग रामकली ताल तिताला)
अब तुम अपनी ओर निहारो।
हमरे अवगुन पै नहिं जाओ, तुमहीं अपना बिरद सम्हारो॥ [1]
जुग जुग साख तुम्हारी ऐसी, बेद पुरानन गाई।
पतित उधारन नाम तुम्हारो, यह सुनके मन दृढ़ता आई॥ [2]
मैं अजान तुम सब कछु जानो, घट-घट अंतरजामी।
मैं तो चरन तुम्हारे लागी, हो किरपाल दयालहि स्वामी॥ [3]
हाथ जोरिकै अरज करत हौं, अपनाओ गहि बाहीं।
द्वार तिहारे आय परी हौं, पौरुष गुन मोमें कछु नाहीं॥ [4]
- श्री सहजो बाई
हे परम कृपालु, श्री श्याम श्याम! अब आप अपनी ओर निहारो । मेरे अवगुणों को न देखते हुए आप अपनी प्रतिष्ठा पर विचार कीजिए । [1]
आपके यशोगान को युगों युगों से वेद पुराण ने गाया है कि आपका नाम ‘पतित उद्धारन’ है (अर्थात् जो सदा पतितों का उद्धार करते हैं) जिसको सुनकर मेरे मन में भी दृढ़ता आई है कि मेरा कल्याण भी आपके द्वारा संभव है । [2]
मैं अज्ञानी हूँ, लेकिन आप सब कुछ जानने वाले हैं, आप अंतर्यामी प्रभु हैं जो सबके हृदय की बात को जानते हैं । इसीलिए हे परम कृपालु स्वामी! मैं तो आपके चरणों से लग गई हूँ । [3]
मैं अपने दोनों हाथों को जोड़ कर आपसे यही विनती करती हूँ कि आप मेरा हाथ पकड़ कर मुझे सम्भालें । श्री सहजो बाई जी कहती हैं कि मैं तो आपके द्वार पर पड़ी हूँ और मेरे में अन्य किसी प्रकार का पौरुष बल आदि भी नहीं है । [4]
अब तुम अपनी ओर निहारो।
हमरे अवगुन पै नहिं जाओ, तुमहीं अपना बिरद सम्हारो॥ [1]
जुग जुग साख तुम्हारी ऐसी, बेद पुरानन गाई।
पतित उधारन नाम तुम्हारो, यह सुनके मन दृढ़ता आई॥ [2]
मैं अजान तुम सब कछु जानो, घट-घट अंतरजामी।
मैं तो चरन तुम्हारे लागी, हो किरपाल दयालहि स्वामी॥ [3]
हाथ जोरिकै अरज करत हौं, अपनाओ गहि बाहीं।
द्वार तिहारे आय परी हौं, पौरुष गुन मोमें कछु नाहीं॥ [4]
- श्री सहजो बाई
हे परम कृपालु, श्री श्याम श्याम! अब आप अपनी ओर निहारो । मेरे अवगुणों को न देखते हुए आप अपनी प्रतिष्ठा पर विचार कीजिए । [1]
आपके यशोगान को युगों युगों से वेद पुराण ने गाया है कि आपका नाम ‘पतित उद्धारन’ है (अर्थात् जो सदा पतितों का उद्धार करते हैं) जिसको सुनकर मेरे मन में भी दृढ़ता आई है कि मेरा कल्याण भी आपके द्वारा संभव है । [2]
मैं अज्ञानी हूँ, लेकिन आप सब कुछ जानने वाले हैं, आप अंतर्यामी प्रभु हैं जो सबके हृदय की बात को जानते हैं । इसीलिए हे परम कृपालु स्वामी! मैं तो आपके चरणों से लग गई हूँ । [3]
मैं अपने दोनों हाथों को जोड़ कर आपसे यही विनती करती हूँ कि आप मेरा हाथ पकड़ कर मुझे सम्भालें । श्री सहजो बाई जी कहती हैं कि मैं तो आपके द्वार पर पड़ी हूँ और मेरे में अन्य किसी प्रकार का पौरुष बल आदि भी नहीं है । [4]

