नैनन नासिका राधिका, राधा मन वच आहि ।
बिछुरत नाहीं राधिका, मोको परयो सुभाइ ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (30)
मेरे नयन, नासिका एवं सभी अंग राधिका हैं, श्री राधा ही मेरे हृदय और वचनों में संपूर्ण रूप से विराजती हैं। ऐसा अब मेरा सहज स्वभाव बन चुका है कि मैं श्री राधिका से एक पल को भी नहीं बिछुड़ सकता।
बिछुरत नाहीं राधिका, मोको परयो सुभाइ ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (30)
मेरे नयन, नासिका एवं सभी अंग राधिका हैं, श्री राधा ही मेरे हृदय और वचनों में संपूर्ण रूप से विराजती हैं। ऐसा अब मेरा सहज स्वभाव बन चुका है कि मैं श्री राधिका से एक पल को भी नहीं बिछुड़ सकता।

