मीन वियोग न सहि सकै - श्री सूरदास, सूर सागर

मीन वियोग न सहि सकै - श्री सूरदास, सूर सागर

मीन वियोग न सहि सकै, नीर न पूछै बात।
देखि जु तू ताकी गतिहि, रति न घटै तन जात॥

- श्री सूरदास, सूर सागर

चाहे नीर (पानी) मछली की बात भी नहीं पूछता फिर भी मछली तो पानी का वियोग नहीं सह सकती। तुम मछली के प्रेम की निराली गति को देखो कि इसका शरीर चला जाता है तो भी उसका पानी के प्रति प्रेम रत्ती-भर भी कम नहीं होता।